Edited By Niyati Bhandari,Updated: 27 Oct, 2026 02:44 PM

Karwa Chauth Thali Batana Song: करवा चौथ की पूजा में थाली फेरते समय गाया जाने वाला 'वीरा कुड़िए करवड़ा' गीत का क्या महत्व है?
Karwa Chauth Thali Batana Song: सुहागिनों का सबसे बड़ा और पवित्र पर्व करवा चौथ हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को अपार श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन शादीशुदा महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और अखंड सौभाग्य के लिए दिनभर निर्जला उपवास रखती हैं। शाम के समय जब सभी सुहागिनें एक साथ बैठकर करवा माता की कथा सुनती हैं, तो पूजा की थाली को एक-दूसरे के साथ घुमाने (थाली फेरने या बंटाने) की एक बेहद खास रस्म निभाई जाती है।

करवा खेलना
करवा चौथ के दिन शाम को सभी सुहागिनें खूब सज-धज कर एक नियत स्थान पर इकट्ठी होती हैं और गोल घेरे में बैठ कर अपनी पूजा की थाली एक-दूसरे के साथ बांटती हुई करवा के गीत गाती हैं। इसी दौरान पंडित जी महिलाओं को करवाचौथ की कथा सुनाते हैं। फिर थाली बंटाते हुए ये गीत गाती हैं-

वीरा कुड़िए करवड़ा, सर्व सुहागन करवड़ा,
ए कटी न अटेरीं न, खुंब चरखड़ा फेरीं ना,
ग्वांड पैर पाईं ना, सुई च धागा फेरीं ना,
रुठड़ा मनाईं ना, सुतड़ा जगाईं ना,
बहन प्यारी वीरां, चंद चढ़े ते पानी पीना,
लै वीरां कुड़िए करवड़ा, लै सर्व सुहागिन करवड़ा।
इस लोकगीत में एक बहन अपने भाई (वीरा) और परिवार को साक्षी मानकर करवा माता से अपने सुहाग की रक्षा की प्रार्थना करती है और व्रत के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों का जिक्र करती है।

करवा चौथ का व्रत सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक का व्रत है। जो विशेष तौर पर सुहागन महिलाओं द्वारा सदा सुहागन रहने की कामना से किया जाता है। इसे करक-चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। इस व्रत में महिलाएं सूर्योदय से पहले सुबह चार बजे के करीब शिव-परिवार की पूजा करके व्रत का संकल्प लेती हैं। वे नहा-धोकर सबसे पहले सासू मां के लिए बया निकालती हैं। ‘बया’ यानी एक थाली में फल, मिठाई, नारियल, कपड़े और सुहाग का सामान जैसे रिबन, चूड़िया, मेहंदी, सिंदूर, बिंदी आदि रख कर सासू मां को दिया जाता है और उनके पांव छूकर आशीर्वाद लिया जाता है। इसके बाद ‘सरगी’ खाने का विधान है। सरगी में फल, मिठाई वगैरह सासू मां की तरफ से और लड़की के मायके की तरफ से भी भेजे जाते हैं। सरगी खाने के बाद पूरा दिन जब तक रात को चांद नहीं निकलता तब तक निर्जला रह कर औरतें व्रत रखती हैं। जब रात को चांद निकलता है तो वे अर्घ्य देकर पति के हाथों जल ग्रहण करती हैं और तब उनका व्रत पूरा होता है।
