Edited By Niyati Bhandari,Updated: 23 Jun, 2026 02:35 PM

Kheer bhawani mandir: मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले में स्थित माता खीर भवानी का मंदिर न केवल कश्मीरी पंडितों की अगाध श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि यह अपने उस अद्भुत चमत्कार के लिए भी विश्व प्रसिद्ध है जिसे आज तक विज्ञान भी नहीं सुलझा पाया। ज्येष्ठ...
तुलमुल्ला (एजैंसी): कश्मीरी पंडित समुदाय के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक उत्सवों में से एक 'ज्येष्ठ अष्टमी' के अवसर पर सोमवार को हजारों श्रद्धालु यहां खीर भवानी मंदिर में एकत्र हुए तथा वैदिक मंत्रोच्चार और शंखनाद के बीच यह पर्व मनाया।
इस वार्षिक उत्सव में इस बार हाल के वर्षों की तुलना में सबसे अधिक श्रद्धालुओं की मौजूदगी दर्ज की गई। देश के विभिन्न हिस्सों से आए श्रद्धालुओं ने मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले में स्थित मंदिर परिसर में माता रागन्या भगवती के दर्शन किए। माता रागन्या भगवती, जिन्हें 'माता क्षीर भवानी' भी कहा जाता है, देवी पार्वती का एक अत्यंत पवित्र और पूजनीय स्वरूप हैं।

उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के साथ मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया। यह उत्सव देवी रागन्या भगवती के प्रकटोत्सव के रूप में मनाया जाता है। कश्मीर में देवी को समर्पित कई मंदिरों में यह पर्व मनाया जाता है, जिनमें तुलमुल्ला में खीर भवानी, देवसर में त्रिपुर सुंदरी, मंजगाम में रागन्या भगवती, लोकतीपोरा और टिक्कर शामिल हैं।

खीर भवानी मंदिर का गौरवशाली इतिहास
खीर भवानी मंदिर भारत के चमत्कारी व अनोखे मंदिरों में से एक है। जिसका राज आज तक वैज्ञानिक भी पता नहीं लगा पाए।
इस मंदिर में प्राकृतिक आपदा से पूर्व संकेत मिलते हैं। ये मंदिर कश्मीर के गंदेरबल जिले में खीर भवानी और राज्ञा देवी मंदिर के नाम से स्थित है। मान्यताओं के मुताबिक यहां पर दुर्गा मां भव्य रूप में विराजित हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना कश्मीर में हनुमान जी ने की थी। मंदिर को लेकर मान्यता है कि यहां पर जो भी श्रृद्धालु नंगे पांव चलकर आता है मां दुर्गा उसकी मनोकामना ज़रूर पूरी करती हैं। पुरूष श्रद्धालु मंदिर के समीप जलधारा में स्नान करते हैं। उसके बाद वे मंदिर परिसर में स्थित जलकुण्ड में खीर चढ़ाते हैं। माना जाता है कि, मंदिर के नीचे बहने वाली जलधारा के पानी का रंग घाटी के कल्याण का संकेत देता है। अगर इसका जल काला होता है, तो ये अशुभ माना जाता है।

कहते हैं कि किसी प्राकृतिक आपदा के आने से पहले मंदिर के कुंड का पानी काला पड़ जाता है। तो वहीं स्थानीय लोगों का ये भी मानना है कि खीर, जो सामान्य रूप से सफेद रंग की होती है उसका रंग काला हो जाता है। जो अप्रत्याशित विपत्ति का संकेत होता है। मई के महीने में पूर्णिमा के आठवें दिन बड़ी संख्या में भक्त यहां एकत्रित होते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस शुभ दिन पर देवी पानी का रंग बदलती है। इस तरह स्थानीय लोगों को संकट की सूचना पहले ही मिल जाती है। लोग इसे माता का चमत्कार मानते हैं।

मंदिर में हर साल एक पारंपरिक मेला लगता है। जो की पारंपरिक श्रद्धा और हर्षोल्लास से मनाया जाता है। हर साल लगने वाले इस मेले को खीर भवानी मेला कहते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु धार्मिक मंत्रोच्चार के बीच मंदिर में घंटे बजाकर देवी के दर्शन करते हैं।

खीर भवानी मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा
ये रामाणय काल की बात है। पहले खीर भवानी माता का मंदिर श्रीलंका में था। यहां माता की स्थापना रावण ने की थी। रावण ने कड़ी साधना कर माता को प्रसन्न किया था और मंदिर बनाया था। हालांकि बाद में रावण के बुरे कार्यों से माता रुठ गईं थी।
जब माता सीता की तलाश में हनुमान जी लंका पहुंचे तो माता ने उनसे कहा कि वे उन्हें अन्यत्र स्थापित करें। तब हनुमान जी ने माता को कश्मीर के तुलमुल गांव में स्थापित किया था। तब से ये मंदिर श्रीनगर से 14 किलोमीटर दूर गान्दरबल जिले में स्थित है।
इस मंदिर के चारों ओर चिनार के पेड़ और नदियों की धाराएं हैं, जो यहां की सुंदरता को बढ़ाती हैं। और इस मंदिर की ख़ासियत ये है कि यहां पर प्रसाद के रूप में भक्तों द्वारा केवल एक भारतीय मिठाई खीर और दूध ही चढ़ाया जाता है। वास्तविक रूप से 1912 में महाराजा प्रताप सिंह द्वारा हिंदू देवी राग्न्य के सम्मान में बनवाए गए इस मंदिर का पुनर्निर्माण महाराजा हरि सिंह ने किया।
