Edited By Prachi Sharma,Updated: 15 Feb, 2026 03:32 PM

Mahabharat Katha : महाभारत की कथा धर्म और अधर्म के संघर्ष की अमर गाथा है। कुरुक्षेत्र के युद्ध में कौरवों का संपूर्ण वंश लगभग समाप्त हो गया, लेकिन सौ भाइयों में एक ऐसा भी था जिसने अन्याय के बीच रहते हुए भी न्याय की आवाज बुलंद की। जब सभा में दुर्योधन...
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Mahabharat Katha : महाभारत की कथा धर्म और अधर्म के संघर्ष की अमर गाथा है। कुरुक्षेत्र के युद्ध में कौरवों का संपूर्ण वंश लगभग समाप्त हो गया, लेकिन सौ भाइयों में एक ऐसा भी था जिसने अन्याय के बीच रहते हुए भी न्याय की आवाज बुलंद की। जब सभा में दुर्योधन और दुशासन द्रौपदी का अपमान कर रहे थे और भीष्म, द्रोण तथा धृतराष्ट्र जैसे वरिष्ठ मौन थे, तब एक कौरव ने खुलकर इसका विरोध किया। यही कारण है कि उसका नाम आज भी अलग सम्मान से लिया जाता है।
यह कौरव था विकर्ण। वह धृतराष्ट्र का पुत्र था, लेकिन स्वभाव और विचारों में अपने भाइयों से भिन्न था। द्यूत क्रीड़ा में जब युधिष्ठिर द्रौपदी को दांव पर हार गए और सभा में उनका अपमान होने लगा, तब विकर्ण ने इसे धर्म और शास्त्रों के विरुद्ध बताया। उसने तर्क दिया कि जब युधिष्ठिर स्वयं को ही हार चुके थे, तो उन्हें द्रौपदी को दांव पर लगाने का अधिकार कैसे हो सकता है। उसके इन शब्दों से सभा में हलचल मच गई, पर उसने सत्य का साथ नहीं छोड़ा।

हालांकि उसने अन्याय का विरोध किया, फिर भी युद्ध के समय वह कौरव पक्ष में ही रहा। युद्धभूमि में उसका सामना भीम से हुआ। कहा जाता है कि भीम उसके स्वभाव और धर्मनिष्ठा से परिचित थे, इसलिए उससे युद्ध करते समय उनके मन में द्वंद्व था। अंततः भीम ने अपनी प्रतिज्ञा निभाते हुए विकर्ण का वध किया।
अक्सर लोग विकर्ण और युयुत्सु को लेकर भ्रमित हो जाते हैं। युयुत्सु भी धृतराष्ट्र के पुत्र थे, लेकिन उन्होंने युद्ध से ठीक पहले अधर्म का साथ छोड़कर पांडवों का पक्ष चुना। इसी कारण वे युद्ध के बाद जीवित बचे।
इस प्रकार, सौ कौरव भाइयों में विकर्ण न्यायप्रियता के लिए और युयुत्सु धर्म का साथ देने के निर्णय के लिए विशेष रूप से स्मरण किए जाते हैं। महाभारत की यह कथा सिखाती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी सत्य का साथ देने वाला व्यक्ति इतिहास में अलग पहचान बना लेता है।
