Mahashivratri 2026 : आखिर क्यों शिवजी के मस्तक पर विराजमान है चंद्रमा ? जानें रहस्यमयी कथा

Edited By Updated: 14 Feb, 2026 01:29 PM

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भगवान शिव, जिन्हें हम विनाशक और वैरागी के रूप में पूजते हैं, उनका हर आभूषण अपने आप में एक गहरा रहस्य और जीवन दर्शन समेटे हुए है। गले में लिपटे नाग, जटाओं से बहती गंगा और हाथों में त्रिशूल के बीच, उनके मस्तक पर विराजमान चंद्रमा विशेष रूप से ध्यान...

Mahashivratri 2026 : भगवान शिव, जिन्हें हम विनाशक और वैरागी के रूप में पूजते हैं, उनका हर आभूषण अपने आप में एक गहरा रहस्य और जीवन दर्शन समेटे हुए है। गले में लिपटे नाग, जटाओं से बहती गंगा और हाथों में त्रिशूल के बीच, उनके मस्तक पर विराजमान चंद्रमा विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि समस्त ब्रह्मांड के स्वामी ने एक क्षय होते हुए चंद्रमा को अपने माथे पर स्थान क्यों दिया। पौराणिक गलियारों में इसके पीछे दो अत्यंत प्रभावशाली गाथाएं सुनने को मिलती हैं। एक ओर जहां यह समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष की भयंकर ज्वाला को शांत करने की कहानी है, वहीं दूसरी ओर यह राजा दक्ष के उस भीषण श्राप से जुड़ी है, जिसने चंद्रमा के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया था। तो आइए जानते हैं महादेव के चंद्रमा को अपने मस्तक में धारण करने की वजह के बारे में-

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पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ, तो उसमें से सबसे पहले हलाहल नामक भयंकर विष निकला। उस विष की अग्नि इतनी तीव्र थी कि समस्त ब्रह्मांड जलने लगा। सृष्टि की रक्षा के लिए महादेव ने उस विष का पान कर लिया। विष के प्रभाव से महादेव का शरीर और कंठ अत्यधिक गर्म होने लगा। विष की उस प्रचंड ऊष्मा को शांत करने के लिए महादेव ने शीतल चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण किया। चंद्रमा की शीतलता ने विष के ताप को कम करने में मदद की। यही कारण है कि शिवरात्रि पर उन्हें जल और दूध चढ़ाया जाता है ताकि उन्हें शीतलता मिले।

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दूसरी प्रसिद्ध कथा प्रजापति दक्ष और उनकी 27 पुत्रियों से जुड़ी है। ये सभी 27 बहनें चंद्रमा की पत्नियां थीं। चंद्रमा का प्रेम अपनी एक पत्नी रोहिणी के प्रति सबसे अधिक था, जिससे अन्य बहनें दुखी रहती थीं। जब यह बात राजा दक्ष को पता चली, तो उन्होंने क्रोध में आकर चंद्रमा को क्षय रोग दे दिया। श्राप के कारण चंद्रमा का तेज धीरे-धीरे खत्म होने लगा। तब चंद्रमा ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। महादेव चंद्रमा की भक्ति से प्रसन्न हुए, लेकिन वे दक्ष के श्राप को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते थे। इसलिए उन्होंने चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण कर लिया, जिससे चंद्रमा को जीवनदान मिला और वे पूरी तरह नष्ट होने से बच गए। महादेव की कृपा से ही चंद्रमा 15 दिन घटते हैं और 15 दिन बढ़ते हैं।

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