Shabari Jayanti Katha : शबरी जयंती पर पढ़ें यह चमत्कारी कथा, मिलेगा मोक्ष और प्रभु राम का आशीर्वाद

Edited By Updated: 07 Feb, 2026 03:56 PM

shabari jayanti katha

हिंदू धर्म में शबरी जयंती का विशेष महत्व है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि सनातन धर्म में भक्ति और अटूट विश्वास के उत्सव के रूप में मनाई जाती है। इसी पावन तिथि को शबरी जयंती के रूप में जाना जाता है।

Shabari Jayanti Katha : हिंदू धर्म में शबरी जयंती का विशेष महत्व है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि सनातन धर्म में भक्ति और अटूट विश्वास के उत्सव के रूप में मनाई जाती है। इसी पावन तिथि को शबरी जयंती के रूप में जाना जाता है। वर्ष 2026 में 8 फरवरी, रविवार को यह पर्व श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा। इस विशेष दिन पर श्रद्धालु माता शबरी और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की आराधना करते हैं। कई भक्त इस दिन उपवास रखकर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। माना जाता है कि शबरी जयंती की पौराणिक कथा के श्रवण या पठन के बिना यह व्रत अधूरा रहता है। माता शबरी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्ची और निस्वार्थ भक्ति से स्वयं ईश्वर को भी प्राप्त किया जा सकता है। तो आइए जानते हैं इस गौरवशाली कथा के माध्यम से माता शबरी की आध्यात्मिक यात्रा और उनके अटूट प्रेम के रहस्यों के बारे में-

Shabari Jayanti Katha

शबरी जयंती की कथा
शबरी जिनका वास्तविक नाम श्रमणा था एक भील परिवार में जन्मी थीं।उनके मन में बचपन से ही ईश्वर को पाने की व्याकुलता थी। जब उनके विवाह की बात चली और उन्होंने देखा कि परंपरा के नाम पर अनेक निर्दोष पशुओं की बलि दी जाने वाली है, तो उनका कोमल हृदय कांप उठा। अहिंसा और सत्य की खोज में उन्होंने घर त्याग दिया और ऋषि मतंग के आश्रम की शरण ली। ऋषि मतंग शबरी की सेवा और भक्ति से अत्यंत प्रसन्न थे। जब ऋषि का अंतिम समय निकट आया, तो शबरी व्याकुल हो उठीं कि उनके जाने के बाद वे किसके सहारे जिएंगी। 

तब गुरु मतंग ने एक अमूल्य मंत्र दिया— "पुत्री, धैर्य रख। इसी आश्रम में एक दिन स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम तुझसे मिलने आएंगे।"

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गुरु के वचनों पर शबरी को अटूट विश्वास था। तब से शबरी का हर दिन भगवान राम के स्वागत की तैयारी बन गया। वे प्रतिदिन रास्ते के पत्थर और कांटे चुनतीं ताकि प्रभु के चरणों में कष्ट न हो। वन से मीठे बेर चुनकर लातीं। वे हर बेर को चखकर देखती थीं कि कहीं कोई बेर खट्टा न हो और प्रभु का मुंह खराब न हो जाए। वर्ष बीत गए, शबरी वृद्ध हो गईं, उनकी आंखों की रोशनी कम हो गई, लेकिन उनका विश्वास कम नहीं हुआ। अंततः वनवास के दौरान माता सीता की खोज में निकलते हुए भगवान राम और लक्ष्मण शबरी की कुटिया में पहुंचे।

भगवान राम ने शबरी के प्रेम को देखा। जब शबरी ने संकोचवश अपने चखे हुए जूठे बेर प्रभु को अर्पित किए, तो मर्यादा पुरुषोत्तम ने बिना किसी भेद-भाव के बड़े चाव से उन्हें ग्रहण किया। 

लक्ष्मण जी को थोड़ा संकोच हुआ, लेकिन राम जी ने कहा— "लक्ष्मण, मैंने अनेक प्रकार के छप्पन भोग खाए हैं, पर जो स्वाद इन जूठे बेरों में है, वह केवल शबरी की ममता और भक्ति के कारण है।"

इसी अवसर पर भगवान राम ने शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया था। उन्होंने बताया कि वे केवल प्रेम और भक्ति के संबंध को मानते हैं, जाति, कुल या वैभव को नहीं। अंत में, प्रभु के साक्षात दर्शन पाकर शबरी ने योगाग्नि द्वारा अपना शरीर त्याग दिया और मोक्ष को प्राप्त किया। यह कथा शबरी की निष्काम भक्ति, प्रेम और समर्पण का अनुपम उदाहरण मानी जाती है।

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