Rahu Ketu Ki Kahani: एक असुर से कैसे बने राहु और केतु? जानें ग्रहों में स्थान मिलने की पौराणिक कथा

Edited By Updated: 10 Feb, 2026 02:37 PM

rahu ketu ki kahani

Rahu Aur Ketu Ki Kahani: हिंदू ज्योतिष शास्त्र में 9 ग्रहों और 27 नक्षत्रों का विशेष महत्व बताया गया है। इन नौ ग्रहों में सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि के साथ-साथ राहु और केतु भी शामिल हैं। हालांकि, राहु और केतु अन्य ग्रहों की तरह...

Rahu Aur Ketu Ki Kahani: हिंदू ज्योतिष शास्त्र में 9 ग्रहों और 27 नक्षत्रों का विशेष महत्व बताया गया है। इन नौ ग्रहों में सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि के साथ-साथ राहु और केतु भी शामिल हैं। हालांकि, राहु और केतु अन्य ग्रहों की तरह भौतिक रूप से अस्तित्व में नहीं हैं। ज्योतिष शास्त्र में इन्हें छाया ग्रह कहा गया है।

धार्मिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार, राहु और केतु किसी देवता नहीं बल्कि एक असुर के शरीर के दो हिस्से माने जाते हैं। यही कारण है कि राहु-केतु का प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर कभी अत्यंत शुभ तो कभी बेहद अशुभ माना जाता है। आइए जानते हैं कि यह असुर कौन था और कैसे उसके शरीर के भाग राहु और केतु ग्रह बने।

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समुद्र मंथन से जुड़ी है राहु-केतु की उत्पत्ति
राहु और केतु की उत्पत्ति की कथा समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है। पुराणों के अनुसार, देवताओं और असुरों ने मिलकर अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया था। मंथन के दौरान जब अमृत कलश प्रकट हुआ, तो उसे लेकर देवताओं और असुरों के बीच विवाद हो गया।

अमृत पर अधिकार को लेकर दोनों पक्षों में तनाव बढ़ता देख भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया। मोहिनी ने देवताओं और असुरों से कहा कि वह स्वयं सभी को समान रूप से अमृत पिलाएंगी। मोहिनी के सौंदर्य और वचनों से मोहित होकर देवता और असुर दोनों ही मान गए।

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देवताओं का वेश धारण कर असुर ने पी लिया अमृत
मोहिनी रूप में भगवान विष्णु ने चतुराई से केवल देवताओं को ही अमृत पिलाना शुरू किया। लेकिन इस दौरान स्वर्भानु नामक एक असुर ने उनकी योजना भांप ली। उसने देवताओं का वेश धारण किया और देवताओं की पंक्ति में बैठकर अमृत का पान कर लिया।

हालांकि, सूर्य देव और चंद्र देव ने स्वर्भानु को पहचान लिया और तुरंत भगवान विष्णु को इसकी सूचना दी।

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स्वर्भानु का सिर बना राहु और धड़ बना केतु
सूचना मिलते ही भगवान विष्णु ने अपने वास्तविक रूप में आकर सुदर्शन चक्र से स्वर्भानु का सिर धड़ से अलग कर दिया। लेकिन तब तक स्वर्भानु अमृत का सेवन कर चुका था, इसलिए वह पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ।

अमृत के प्रभाव से उसका सिर और धड़ दोनों अमर हो गए। स्वर्भानु के सिर को राहु कहा गया और उसके धड़ को केतु के नाम से जाना गया। यही कारण है कि राहु और केतु को ग्रहों की सूची में एक विशेष स्थान दिया गया।

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ज्योतिष में राहु-केतु का महत्व
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, राहु और केतु व्यक्ति के जीवन में कर्म, भ्रम, अचानक घटनाओं, रहस्य, मोक्ष और परिवर्तन से जुड़े माने जाते हैं। ये ग्रह जीवन में अचानक उतार-चढ़ाव लाते हैं और व्यक्ति को उसके कर्मों का फल प्रदान करते हैं।

राहु और केतु की कथा यह दर्शाती है कि कैसे एक असुर के शरीर के दो भाग ज्योतिष में अत्यंत प्रभावशाली ग्रह बन गए। इन्हें समझना कुंडली विश्लेषण में बेहद जरूरी माना जाता है।

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