Krishna Ji Ki Bansuri Ka Naam : किस नाम से जानी जाती थी कृष्ण की बांसुरी ? जानिए उस वंशी की कहानी जिसने सबको मोहित कर लिया

Edited By Updated: 02 Feb, 2026 06:26 PM

krishna ji ki bansuri ka naam

Krishna Ji Ki Bansuri Ka Naam : भगवान श्रीकृष्ण और उनकी बांसुरी का संबंध भारतीय परंपरा में अत्यंत पवित्र और भावनात्मक माना जाता है। उनकी वंशी केवल संगीत का साधन नहीं थी, बल्कि प्रेम, भक्ति और आत्मिक शांति का माध्यम भी थी। जब कृष्ण बांसुरी बजाते थे,...

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Krishna Ji Ki Bansuri Ka Naam : भगवान श्रीकृष्ण और उनकी बांसुरी का संबंध भारतीय परंपरा में अत्यंत पवित्र और भावनात्मक माना जाता है। उनकी वंशी केवल संगीत का साधन नहीं थी, बल्कि प्रेम, भक्ति और आत्मिक शांति का माध्यम भी थी। जब कृष्ण बांसुरी बजाते थे, तो उसकी मधुर धुन से पूरा वातावरण बदल जाता था। गोपियां, पशु-पक्षी और प्रकृति तक उस स्वर में खो जाते थे। ऐसा लगता था मानो हर मन ईश्वर से जुड़ गया हो।

Krishna Ji Ki Bansuri Ka Naam

पौराणिक कथाओं में कृष्ण की कई बांसुरियों का उल्लेख मिलता है, लेकिन उनमें सबसे विशेष मानी जाती है उनकी प्रिय मंदाकिनी वंशी। इसकी धुन को सुनना किसी दिव्य अनुभव से कम नहीं था। यह केवल एक वाद्य यंत्र नहीं थी, बल्कि उसमें आध्यात्मिक शक्ति और प्रेम की ऊर्जा समाहित थी।

कृष्ण की प्रसिद्ध बांसुरियां

शास्त्रों और कथाओं में कृष्ण की कई वंशी का वर्णन मिलता है, जैसे—
महानंदा — जिसकी आवाज बहुत दूर तक सुनाई देती थी
सरला — छोटी और बेहद मधुर स्वर वाली
भुवनमोहिनी — जो सभी को मोहित कर लेती थी
मदनझंकृति — छह छिद्रों वाली विशेष बांसुरी

इन सबमें मंदाकिनी वंशी को सबसे अधिक महत्व दिया गया, क्योंकि यही कृष्ण की सबसे प्रिय मानी जाती थी।

देवताओं की भेंट और शिव का योगदान
जब द्वापर युग में भगवान कृष्ण पृथ्वी पर अवतरित हुए, तब अनेक देवी-देवता उन्हें देखने और आशीर्वाद देने आए। सभी चाहते थे कि वे उन्हें कोई ऐसा उपहार दें, जो कृष्ण को प्रिय हो। भगवान शिव ने महसूस किया कि कृष्ण को संगीत से विशेष लगाव है। इसलिए उन्होंने एक ऐसी दिव्य बांसुरी बनाने का विचार किया, जो केवल धुन ही न बजाए, बल्कि प्रेम और शक्ति का प्रतीक भी बने।

Krishna Ji Ki Bansuri Ka Naam

ऋषि दधीचि से जुड़ा रहस्य
मान्यता के अनुसार, ऋषि दधीचि की अस्थियों में अद्भुत शक्ति थी। उन्हीं अस्थियों से पहले इंद्र का वज्र बनाया गया था। उसी दिव्य तत्व से विश्वकर्मा ने एक विशेष बांसुरी का निर्माण किया। इसमें त्याग, तपस्या और पवित्रता का सार समाया हुआ था। जब यह बांसुरी बनकर तैयार हुई, तो भगवान शिव ने इसे कृष्ण को भेंट किया। जैसे ही कृष्ण ने पहली बार इसे बजाया, पूरे गोकुल में शांति और आनंद की लहर दौड़ गई। मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी और प्रकृति तक उस धुन में खो गई। इसी कारण इसे सम्मोहिनी वंशी भी कहा गया।

बांसुरी का आध्यात्मिक महत्व
कृष्ण की बांसुरी केवल मनोरंजन का साधन नहीं थी। वह आत्मा की आवाज थी। उसकी धुन सुनकर लोगों के मन से दुख, भय, तनाव और अहंकार दूर हो जाते थे। वह इंसान को सीधे ईश्वर से जोड़ देती थी। कृष्ण की कथाओं में उनकी वंशी को हमेशा प्रेम, करुणा और भक्ति का प्रतीक बताया गया है। मंदाकिनी बांसुरी ने गोकुल से लेकर पूरे संसार तक भक्ति और सद्भाव का संदेश फैलाया। यह कहानी हमें सिखाती है कि जब किसी वस्तु में प्रेम, त्याग और ईश्वर-भाव जुड़ जाए, तो वह साधारण नहीं रहती, बल्कि दिव्यता का रूप ले लेती है।

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