Edited By Sarita Thapa,Updated: 11 Feb, 2026 04:21 PM

भारतीय इतिहास के पन्नों में जब भी समाज सुधार और आध्यात्मिक क्रांति का जिक्र होता है, महर्षि दयानंद सरस्वती का नाम सबसे अग्रिम पंक्ति में आता है।
Maharshi Dayanand Saraswati Jayanti 2026 : भारतीय इतिहास के पन्नों में जब भी समाज सुधार और आध्यात्मिक क्रांति का जिक्र होता है, महर्षि दयानंद सरस्वती का नाम सबसे अग्रिम पंक्ति में आता है। वेदों की ओर लौटें का अमर संदेश देने वाले और आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद की जयंती केवल एक कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि सत्य, साहस और ज्ञान के उत्सव का दिन है। उन्होंने न केवल धर्म के नाम पर फैली कुरीतियों पर प्रहार किया, बल्कि स्वराज की भावना को भी जन-जन के मन में बोया। वर्ष 2026 में हम उनकी जन्म वर्षगांठ एक बार फिर हर्षोल्लास के साथ मनाने जा रहे हैं। चूंकि उनकी जयंती हिंदू पंचांग की तिथियों के अनुसार तय होती है, इसलिए अक्सर लोगों के मन में इसकी सही तारीख और मुहूर्त को लेकर जिज्ञासा बनी रहती है। तो आइए जानते हैं महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती की सही डेट और इसके क्यों मनाया जाता है इसके बारे में-
कब है महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती 2026 ?
वर्ष 2026 में महर्षि दयानंद सरस्वती की जन्म वर्षगांठ 12 फरवरी 2026 गुरुवार को मनाई जाएगी। महर्षि का जन्म 1824 में गुजरात के टंकारा में हुआ था। उनके बचपन का नाम मूलशंकर था, लेकिन ज्ञान की खोज और सत्य के साक्षात्कार ने उन्हें दयानंद सरस्वती बना दिया।

क्यों मनाई जाती है यह जयंती ?
उन्होंने 1875 में 'आर्य समाज' की स्थापना की, जिसका मुख्य सिद्धांत था- वेदों की ओर लौटें। उन्होंने वेदों को ज्ञान का सर्वोच्च स्रोत बताया। महर्षि ने समाज में व्याप्त छुआछूत, बाल विवाह और सती प्रथा जैसी बुराइयों के खिलाफ पुरजोर आवाज उठाई।उस दौर में उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और उनके अधिकारों की वकालत की, जो उस समय एक अत्यंत साहसी कदम था। इतिहासकारों के अनुसार, महर्षि दयानंद ही पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 'स्वराज्य' शब्द का प्रयोग किया था, जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने आगे बढ़ाया।
महर्षि दयानंद सरस्वती के 5 अनमोल विचार
ज्ञान का महत्व: अज्ञानता ही सभी दुखों और बुराइयों की जड़ है। ज्ञान ही वह प्रकाश है जो हमें मुक्ति दिला सकता है।
सत्य का मार्ग: सत्य को बोलना और सत्य पर चलना ही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है।
ईश्वर की एकता: ईश्वर एक है, लेकिन उसे जानने और पूजने के मार्ग अलग-अलग हो सकते हैं।
महानता का आधार: कोई भी व्यक्ति अपने जन्म से नहीं, बल्कि अपने कर्मों से महान बनता है।
परोपकार: संसार का उपकार करना ही मनुष्य का मुख्य कर्तव्य होना चाहिए।

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