नारियल पूर्णिमा पर किस देवता की होती है पूजा-अर्चना?

Edited By Updated: 22 Aug, 2021 03:45 PM

narali purnima 2021

चूंकि इस बार के रक्षा बंधन पर्व पर भद्रा का साया नहीं है इस कारण आज पूरा दिन भारत के कई राज्यों में राखी का पर्व मनाया जा रहा है। मगर बता दें भारत के अलग-अलग राज्यों में राखी के पर्व को

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चूंकि इस बार के रक्षा बंधन पर्व पर भद्रा का साया नहीं है इस कारण आज पूरा दिन भारत के कई राज्यों में राखी का पर्व मनाया जा रहा है। मगर बता दें भारत के अलग-अलग राज्यों में राखी के पर्व को विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है। बात करें दक्षिण भारत के समुद्री क्षेत्रों में राखी का पर्व नारियल पूर्णिम के रूप में मनाया जाता है। बता दें कुछ जगहों पर श्रावण मास के द्वितीय दिन से प्रारंभ होकर ये पर्व श्रावण पूर्णिमा तक चलता है। आइए जानते हैं क्या है इस दिन का महत्व- 

प्रचलित मान्यताओं के अनुसार महाराष्ट्र सहित समूचे दक्षिण भारत में और पश्चिमी घाट के साथ साथ समुद्री क्षेत्रों में हिंदू पंचांग के मुताबिक श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को नारियल पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इस दिन इंद्र, वरुण व समद्र देव की पूजा का विधान है। इसके अतिरिक्त इस दिन समुद्र देवता को राखी बांधने की भी मान्यता है। बताया जाता है कि नारियल पूर्णिमा खासकर मछुआरों का त्यौहार माना जाता है। मान्यता है कि मछुआरे भी मछली पकड़ने की शुरुआत इसी दिन से करते हैं। मगर इससे पहले विधि-विधान से भगवान इंद्र और वरुण की पूजा करते हैं।

ऐसे करें पूजा :
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन नारियल को पीले वस्त्र में लपेटकर उसे केल के पत्तों पर रखखर अच्छे से सजाया जाता है और फिर उसे जुलूस के रूप में ले जाते हैं।

इसके बाद नारियल की शिखा समुद्र की ओर रखकर विधिवत पूजा अर्चना करके व मंत्र पढ़ने के बाद समुद्रदेव को नारियल अर्पित करते हैं। अर्थात समुद्र में नारियल बहा दिए जाते हैं ताकि समुद्र देव मानव की हर प्रकार से रक्षा करें। फिर धूप और दीप किया जाता है।

नारियल अर्पण करने के साथ-साथ प्रार्थना की जाती हैं कि 'हे वरुणदेव आपके रौद्ररूप से हमारी रक्षा हो और आपका आशीर्वाद प्राप्त हो'।

बताया जाता है दक्षिण भारत में यह त्यौहार समाज का हर वर्ग अपने अपने विभिन्न प्रकार से मनाता है।

धार्मिक मान्यताएं हैं कि इस दिन जनेऊ धारण करने वाले जनेऊ बदल सकते हैं। जिस कारण इसे अबित्तम के नाम से भी जाना जाता है। इसके अतिरिक्त इस तयौहार को श्रावणी व ऋषि तर्पण भी कहा जाता है।

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