Neem Karoli Baba : बाबा नीम करौली के अनमोल उपदेश, जो बदल देंगे आपकी सोच और तकदीर

Edited By Updated: 22 Jan, 2026 04:02 PM

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Neem Karoli Baba : नीम करोली बाबा, जिन्हें उनके भक्त प्यार से महाराज जी कहते हैं, 20वीं सदी के उन महान संतों में से एक थे जिन्होंने बिना किसी लंबे प्रवचन या आडंबर के दुनिया को मानवता का सबसे सरल पाठ पढ़ाया। उनके संदेशों में न तो कोई जटिल दर्शन था और...

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Neem Karoli Baba : नीम करोली बाबा, जिन्हें उनके भक्त प्यार से महाराज जी कहते हैं, 20वीं सदी के उन महान संतों में से एक थे जिन्होंने बिना किसी लंबे प्रवचन या आडंबर के दुनिया को मानवता का सबसे सरल पाठ पढ़ाया। उनके संदेशों में न तो कोई जटिल दर्शन था और न ही कठिन कर्मकांड। उन्होंने केवल तीन शब्दों में जीवन का सार समझा दिया सबकी सेवा करो, सबसे प्रेम करो, भगवान को याद करो और सच बोलो। आज की भागदौड़ भरी और तनावपूर्ण जिंदगी में नीम करोली बाबा के विचार किसी शीतल छाया की तरह हैं। 

Neem Karoli Baba

सबकी सेवा करो
महाराज जी का सबसे बड़ा संदेश 'सेवा' था। उनका मानना था कि ईश्वर मंदिर या मूर्तियों में ढूंढने से पहले भूखे और जरूरतमंद में ढूंढना चाहिए। वे अक्सर कहते थे कि किसी भूखे को भोजन कराना साक्षात ईश्वर की सेवा करने के समान है। जब हम निस्वार्थ भाव से दूसरों की मदद करते हैं, तो हमारे भीतर का अहंकार  समाप्त होने लगता है। अहंकार का मिटना ही आध्यात्मिक उन्नति की पहली सीढ़ी है।

सबसे प्रेम करो
नीम करोली बाबा के दरबार में कोई छोटा या बड़ा नहीं था। चाहे वो एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स हों, मार्क जुकरबर्ग हों या उत्तराखंड के किसी छोटे गाँव का गरीब किसान महाराज जी का प्रेम सबके लिए एक समान था। उन्होंने सिखाया कि प्रेम में कोई शर्त नहीं होनी चाहिए। जब हम बिना किसी स्वार्थ के प्रेम करते हैं, तो हमारे मन की कड़वाहट और क्रोध स्वतः ही शांत हो जाते हैं।

सच बोलो
सत्य के प्रति महाराज जी का आग्रह बहुत गहरा था। वे कहते थे कि सत्य बोलना कठिन हो सकता है लेकिन यह आत्मा को शुद्ध करता है। झूठ बोलने से व्यक्ति के मन में डर और अपराधबोध पैदा होता है, जो उसकी प्रगति को रोकता है। सत्य बोलने वाला व्यक्ति हमेशा निर्भय रहता है। नीम करोली बाबा के अनुसार, सत्य ही तपस्या का सबसे सरल रूप है।

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सादगी ही सबसे बड़ा चमत्कार है
अक्सर लोग बाबा के पास चमत्कार देखने जाते थे, लेकिन बाबा हमेशा खुद को एक साधारण मनुष्य ही बताते रहे। वे कंबल ओढ़कर एक लकड़ी की चौकी पर बैठते थे। उनकी सादगी में ही उनकी महानता छिपी थी।

पैसा तो हाथ की मैल है, इसे लोगों की भलाई में लगाओ।
महाराज जी कहते थे कि संचय दुख का कारण है। जितना अधिक हम 'मेरा-मेरा' करते हैं, उतने ही हम अशांत होते हैं। जिस दिन हम अपनी जरूरतों को कम कर लेते हैं और सादगी अपनाते हैं, उसी दिन से जीवन में सुख का आगमन शुरू हो जाता है।

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