Edited By Niyati Bhandari,Updated: 28 Feb, 2026 03:10 PM

Benefits of Brahmacharya: इस विशाल संसार में जीने वाला प्रत्येक व्यक्ति निरोगी और दीर्घ जीवन की इच्छा रखता है। कोई कितना भी सांसारिक सुख-वैभव और भोग-सामग्रियों से सम्पन्न क्यों न हो, परंतु यदि वह स्वस्थ नहीं है तो उसके लिए वे सब साधन-सामग्रियां...
Benefits of Brahmacharya: इस विशाल संसार में जीने वाला प्रत्येक व्यक्ति निरोगी और दीर्घ जीवन की इच्छा रखता है। कोई कितना भी सांसारिक सुख-वैभव और भोग-सामग्रियों से सम्पन्न क्यों न हो, परंतु यदि वह स्वस्थ नहीं है तो उसके लिए वे सब साधन-सामग्रियां व्यर्थ हैं।
आरोग्य-शास्त्र के आचार्यों ने उत्तम स्वास्थ्य के लिए मूल चार बातें बतलाई हैं- आहार, श्रम, विश्राम और ब्रह्मचर्य। ब्रह्मचर्य के विषय में आयुर्वेद के देव ‘धन्वंतरी’ ने कहा है कि ‘जो शांति-कांति, स्मृति, ज्ञान, आरोग्य और उत्तम संतति चाहता हो उसे संसार के सर्वोत्तम धर्म ‘ब्रह्मचर्य’ का पालन करना चाहिए’।
इसी प्रकार से आयुर्वेद के आचार्य वाग्भट्ट का यह कहना है कि ‘संसार में जितना सुख है वह आयु के अधीन है और आयु ब्रह्मचर्य के अधीन है’।
तभी तो आयुर्वेद के आदि ग्रंथ ‘चरक संहिता’ में ब्रह्मचर्य को सांसारिक सुख का साधन ही नहीं अपितु मोक्ष का दाता भी बताया गया है।
पौराणिक युग में देखें तो पवनसुत हनुमान, भीष्म पितामह तथा आधुनिक युग में स्वामी दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानंद आदि हस्तियों ने ब्रह्मचर्य की धारणा द्वारा ही परम यश को प्राप्त किया।
स्वामी विवेकानंद ने ‘राजयोग’ नामक अपनी पुस्तक में यह स्पष्ट कहा है कि ‘बिना ब्रह्मचर्य के कोई भी कभी योगी नहीं बन सकता’।
इसी प्रकार से यूनान के महान दार्शनिक सुकरात ने तो यहां तक कह दिया कि ‘काम विकार के लोलुप मनुष्य को पहले अपने कफन और चिता का इंतजाम कर लेना चाहिए, बाद में चाहे जो करे’।
इन सभी तथ्यों एवं महान आत्माओं के कथन द्वारा इतना तो अवश्य सिद्ध होता है कि ‘ब्रह्मचर्य’ मानव का आंतरिक सौंदर्य है जिससे उसे तेज, उत्साह, कार्यक्षमता की वृद्धि आदि विशेषताओं की प्राप्ति होती है।
यूं तो संयमित जीवन जीने की धारणा सम्पूर्ण मानव जाति के लिए कल्याणकारी है परंतु यदि बाल्यकाल से ही इस विषय को शिक्षा के माध्यम द्वारा सिखाया जाए तो इसके बहुत सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।
शास्त्रों में भी यह वर्णित है कि प्रत्येक मनुष्य को बाल्यकाल से लेकर कम से कम 25 वर्ष की आयु तक संयम का पालन करना आवश्यक है क्योंकि यही एक ऐसी शक्ति है जिसके कारण स्मृति-शक्ति का निर्माण होता है, शरीर की नस-नाड़िया पुष्ट रहती हैं और मांसपेशियों में ताकत भरी रहती है।
हम सभी के लिए विद्यार्थीकाल हमारे सम्पूर्ण जीवन का सबसे अनमोल समय होता है क्योंकि इसी के आधार से हमारे सम्पूर्ण भविष्य का निर्माण होता है। इसीलिए विद्यार्थियों को खास करके अपने इस अमूल्य समयकाल को अश्लील साहित्य, अश्लील फिल्म और अश्लील चित्र आदि देखने में नहीं गंवाना चाहिए परन्तु अफसोस की बात तो यह है कि आज भारत का युवा वर्ग अपने लक्ष्य से भटक गया है और खुद को नशीली दवाइयों, शराब और चकाचौंध मचाने वाली दुनिया में खो चुका है।
वह दुखी है पर उसे यह पता नहीं है कि वह क्यों दुखी है इसलिए ही आज सभी जाति, धर्म, देश के लोगों को इस विषय पर गहराई से चिंतन करने की आवश्यकता है।
वर्तमान में चारों ओर हत्या, बलात्कार, गरीबी, भूखमरी, मिलावट, रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी, महंगाई, बीमारी, प्राकृतिक आपदाएं और बेरोजगारी आदि विकराल समस्याएं ऐसे मुंह उठाएं खड़ी हैं, मानो जैसे अभी के अभी सबको खा जाएंगी।
ऐसे समय पर यह विचारणीय बात है कि आखिर इन सारी विषमताओं का मूल क्या है? इसका उत्तर यदि अपने ही बुद्धि-विवेक से तलाशा जाए तो हम पाएंगे कि अत्यधिक जनसंख्या वृद्धि ही इन सभी दुखों की जड़ है परन्तु जनसंख्या विस्फोट का यह तूफान गर्भनिरोधक साधनों या सरकारों द्वारा चलाई जा रही जन्म नियंत्रण योजनाओं से नहीं बल्कि मनुष्य के संयम से ही रुकेगा।
विश्व के अनेक देशों की सरकारें संसार में परिवर्तन चाहती हैं मगर संयम की बात न होने से सारी बातें यथावत् ही रहती हैं। हमें इस बात को गंभीरता से महसूस करना होगा कि यदि जनसंख्या इस कदर ही बढ़ती रही तो दुनिया कहां जाएगी। इन सभी बातों के मद्देनजर मां भारती आज हमसे पवित्रता का सहयोग चाह रही है। अब फैसला तो हमें करना है कि सहयोग दें या नहीं।
-राजयोगी ब्रह्माकुमार निकुंज
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