वनवास के दौरान श्री राम ने बनवाई थी ये 4 चीज़ें

Edited By Updated: 25 May, 2021 12:52 PM

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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्री राम ने वनवास के दौरान जहां जहां अपने कदम रखे उन्हीं स्थानों पर मंदिर कुंड व राम आर्य आदि निर्मित हुए। ग्रंथों में ऐसे कई जगहों का वर्णन मिलता है

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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्री राम ने वनवास के दौरान जहां जहां अपने कदम रखे उन्हीं स्थानों पर मंदिर कुंड व राम आर्य आदि निर्मित हुए। ग्रंथों में ऐसे कई जगहों का वर्णन मिलता है जहां पर श्री राम जी ने जब अपने पग धरे तो उन जगहों की मान्यता बढ़ गई। आज हम आपको श्रीराम द्वारा बनवाई गई कुछ ऐसी ही जगह हो आदि के बारे में बताने जा रहे हैं। कथाओं के अनुसार लंका से लौटने के बाद प्रभु श्री राम ने कई तरह के कार्य किए थे जैसे कि शिवालय, महिला, आश्रम, कुटिया आदि। परंतु जिन कार्यों के बारे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं उन कार्यों को श्री राम ने अपने वनवास के दौरान किया था तो आइए जानते हैं क्या है वह कार्य-

रामायण के अनुसार श्री राम जब गंगा पार करके चित्रकूट पहुंचे थे तो वहां गंगा यमुना के संगम पर ऋषि भारद्वाज का आश्रम था। महर्षि ने श्रीराम को उसी पहाड़ी के ऊपर एक कुटिया बनाने की सलाह दी। जिसके बाद श्रीराम ने वहां पर पर्णकुटी बनाई और वहीं रहने लगे। इसके उपरांत वे नासिक के पंचवटी क्षेत्र में गए यहां भी इन्होंने पर्णकुटी बनाई। फिर सीता माता की खोज में निकले तब रास्ते भर में जहां भी उन्हें कुछ दिनों तक रुकना पड़ता वह वहां पर्णकुटी बनाते। बाद में रामेश्वरम और अंत में श्रीलंका में पर्णकुटी बनाए जाने का उल्लेख कई धार्मिक ग्रंथों में मिलता है।

धार्मिक के किंवदंतिया है कि श्री राम, श्री लक्ष्मण व माता सीता ने वनवास के दौरान खुद ही अपने वस्त्र और खड़ाऊ बनाकर धारण किए थे।

तुलसीदास जी की रामायण के अनुसार भगवान श्री राम ने लंका पर विजय पाने से पहले रामेश्वरम में भगवान शिव की पूजा की थी तथा यहां पर शिवलिंग स्थापित किया था जिसे वर्तमान समय में भगवान शंकर के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है।

लंका में प्रवेश करने के लिए व सीता माता को रावण के चंगुल से छुड़ाने के लिए प्रभु श्री राम ने नल नील के माध्यम से विश्व का पहला सेतु बनवाया था जो समुद्र के ऊपर से गुजरता था। वर्तमान समय में उसे रामसेतु के नाम से जाना जाता है। जबकि पुरानी किंवदंतियों के अनुसार श्री राम ने इस सेतु का नाम नल सेतू रखा था।
 

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