तो क्या अपने सखा के लिए श्री कृष्ण बने थे माखनचोर

Edited By Updated: 27 May, 2021 02:58 PM

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​​​​​​​धार्मिक ग्रंथों के अनुसार बाल्यकाल में भगवान श्री कृष्ण के कई सखा हुआ करते थे, जिनमें सुदामा से लेकर श्रीदामा, मधुमंगल, सुबाहु, सुबल, भद्र, सुभद्र, मणिभद्र, भोज, तोककृष्ण, वरूथप

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धार्मिक ग्रंथों के अनुसार बाल्यकाल में भगवान श्री कृष्ण के कई सखा हुआ करते थे, जिनमें सुदामा से लेकर श्रीदामा, मधुमंगल, सुबाहु, सुबल, भद्र, सुभद्र, मणिभद्र, भोज, तोककृष्ण, वरूथप, मधुकंड, विशाल, रसाल, मकरन्‍द, सदानन्द, चन्द्रहास, बकुल, शारद और बुद्धिप्रकाश आदि तक के नाम शामिल हैं। बाद में इन नामों की सूची में उद्धव और अर्जुन का नाम भी जुड़ गया था। शास्त्रों में इन सबके साथ इनकी मित्रता के कई किस्से पढ़ने व सुनने को मिलते हैं। आज हम आपको इन्हीं में से एक के बारे में आपको बताने जा रहे हैं। दरअसल हम बात करने जा रहे हैं, श्री कृष्ण के उस परम मित्र या सखा की जिसके लिए वे माखनचोर बने थे। यूं तो पुष्टिमार्ग के अनुसार इनके अष्टसखाओं के नाम शामिल हैं। अर्थात इनकी बाल व किशारी लीलाओं के साक्षी इनके 8 सखा थे। परंतु जिसके लिए ये माखनचोर बने वो थे मधुमंगल। 

कथाओं के अनुसार मधुमंगल श्रीकृष्ण के बाल सखा थे, जो गोकुल में रहते थे, जो एक गरीब ब्राह्माण श्रीसांदीपनिजी व पौर्णमासी देवी की संतान थे। यह भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय सखा और परम विनोदी था, इसीलिए उसे 'मसखरे मनसुखा' भी कहते थे। बाल कृष्ण जब भी कोई कार्य करते थे तो मधु मंगल की राय जरूर लेते थे। आइए जानते हैं इनसे जुड़े एक प्रसंग के बारे में-

एक बार भगवान श्री कृष्ण ने अपने सखाओं से कहा कि आज हम सब मधुमंगल के घर में भोजन करेंगे, ऐसा सुनकार मधुमंगल अपने घर गए और अपनी माता पौर्णमासी से कन्हैया के भोजन की व्यवस्था के लिए कहा। इस पर उनकी निर्धन माता ने कहा कि बेटा तुम तो जानते ही हो हमें एक समय का भोजन भी ठीक से नहीं मिल पाता है, हम तुम्हारें सारे सखाओं के लिए भोजन कैसे तैयार कर पाएंगे। 

जिसके बाद मधुमंगल ने अपने घर में कुछ खाने के लिए ढूंढना शुरू कर दिया। इस दौरान उन्होंने पाया कि हांड़ी में तीन दिन पुरानी कड़ी रखी है। मधुमंगल सोचने लगेे कि दूध,दही व माखन खाने वाले अपने प्यारे सखा को मैं ये नहीं खिला सकूंगा। इसलिए मधुमंगल उस कड़ी को झाड़ी में छुपकर  वह अकेले ही पीने लगे। परंतु उसी वक्त वहां पर कन्हैया आ गए और उन्होंने मधुमंगल से इसका कारण पूछा। इस पर मधुमंगल ने सारा वृतांत सुनाया। जिसे सुनकर कन्हैया के प्रेमाश्रु बहने लगे। चूंकि मधु मंगल को भरपेट भोजन नहीं मिलता था इसीलिए वह दुबला पतला और कमजोर था। एक दिन बालकृष्ण ने मधुमंगल अर्थात मनसुखा के कंधे पर हाथ रखकर कहा कि तुम मेरे मित्र हो या नहीं? 

मनसुखा बोला, हां मैं तुम्हारा मित्र हूं। तब कन्हैया ने कहा कि ऐसा दुर्बल मित्र मुझे पसंद नहीं। तुम मेरे जैसे तगड़े हो जाओ। यह सुनकर मनसुखा रोने लगा और बोला, कन्हैया तुम राजा के पुत्र हो। तुम्हारी माता तुम्हें रोज दूध और माखन खिलाती है। इससे तुम तगड़े हो गए हो। मैं तो गरीब हूं। मैंने कभी माखन नहीं खाया। मेरी मां मुझे छाछ ही देती है। यह सुनकर कन्हैया ने कहा कि मैं तुम्हें हर रोज माखन खिलाऊंगा। मनसुखा बोला यदि तुम हर रोज मुझे माखन खिलाओगे तो तुम्हारी मां क्रोधित हो जाएगी। तब कन्हैया कहते हैं कि अरे! अपने घर का नहीं, पर बाहर से कमाकर मैं तुम्हें खिलाऊंगा। ऐसा कहा जाता है कि इसके बाद से ही श्रीकृष्‍ण अपने मित्र के लिए माखन चोर बनकर माखन चुराने लगे। 
 

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