Edited By Niyati Bhandari,Updated: 28 Apr, 2026 01:28 PM

Inspirational story: हममें से बहुत कम लोगों का ध्यान इस बात पर गया होगा कि दिन भर में हम सभी न जाने कितनी बार ‘अच्छा’ शब्द का प्रयोग करते हैं। उदाहरणार्थ कोई बुरी खबर जब कानों में पड़ती है तो जिज्ञासावश हमारे मुख से निकल जाता है ‘अच्छा’?
Inspirational story: हममें से बहुत कम लोगों का ध्यान इस बात पर गया होगा कि दिन भर में हम सभी न जाने कितनी बार ‘अच्छा’ शब्द का प्रयोग करते हैं। उदाहरणार्थ कोई बुरी खबर जब कानों में पड़ती है तो जिज्ञासावश हमारे मुख से निकल जाता है ‘अच्छा’?
इसी प्रकार किसी स्नेही से बिछड़ते वक्त भी हम अक्सर उसे कहते हैं ‘अच्छा... फिर मिलेंगे’ या ‘अच्छा अपना ध्यान रखना’। इन उदाहरणों से इतना तो अवश्य सिद्ध होता है कि हम जो भी करते हैं, उसमें कहीं न कहीं अच्छाई समाई होती है।
तभी तो यह कहावत भी है कि ‘ईश्वर जो करते हैं वह अच्छे के लिए ही करते हैं।’ अब वस्तुत: देखा जाए तो ईश्वर तो सर्व आत्माओं के पिता हैं, अत: उनके हर कार्य में कल्याण ही छिपा हुआ है।
संसार में ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं, जिसे अच्छाई से लगाव न हो, इसका मूल कारण है कि हम आत्माओं के मूलभूत गुण अच्छाई के हैं। एक प्रचलित कहानी कई लोगों ने सुनी होगी, जिसमें एक राजा की उंगली कट जाने पर उसके मंत्री ने कहा, ‘‘ईश्वर जो करता है अच्छा करता है।’’

राजा ने क्रोध में उसे जेल में डाल दिया। कुछ समय बाद राजा शिकार खेलने गया तो कुछ जंगल के वासियों ने राजा को पकड़ कर बलि चढ़ाने की कोशिश की लेकिन उसकी उंगली कटी होने के कारण यह कहते हुए उसे छोड़ दिया कि जिसका कोई अंग कटा होता है, उसकी बलि नहीं चढ़ाते।
राजा ने राजमहल पहुंचते ही मंत्री को जेल से निकाला और कहा, ‘‘आपकी बात ठीक है, नहीं तो आज मैं मौत का शिकार हो जाता लेकिन मंत्री जी यह बताएं कि आप जेल में रहे इसमें क्या अच्छाई थी।’’
मंत्री ने कहा, ‘‘अगर आप मुझे जेल में न डालते तो मैं भी आपके साथ शिकार खेलने जाता और वे लोग मुझे आपकी जगह बलि पर चढ़ा देते।’’
इस कहानी से हमें यह पता चलता है कि हर बात में कल्याण अवश्य समाया होता है, इसलिए हमें किसी भी घटना व परिस्थिति में दुखी न होकर उसमें कल्याण समाया जान कर उस परिस्थिति को पार करना है।
कुछ लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि ‘क्या इसका अर्थ यह है कि दुनिया में जो भी बुरी घटनाएं घट रही हैं, उसके जिम्मेदार भी ईश्वर ही हैं?’
नहीं! क्योंकि संसार में जो कुछ हो रहा है वह ईश्वर नहीं करा रहे बल्कि मनुष्य अपने कर्म कर रहा है और उसका फल पा रहा है। अत: ईश्वर का कार्य तो अच्छा है, किन्तु यदि हम मनुष्य ‘अच्छा-अच्छा’ कहने के बजाय अच्छा देखने, सुनने और बनने में अपनी शक्ति लगाएं तो सचमुच सब कुछ अच्छा होगा और यह दुनिया भी फिर से अच्छी बन जाएगी।
