Narad Jayanti Stotram : नारद जयंती पर करें श्री नारद स्तोत्र का जाप, मिलेगा विष्णु कृपा और ज्ञान का प्रकाश

Edited By Updated: 02 May, 2026 03:01 PM

narad jayanti stotram

हिंदू धर्म में  नारद जयंती का बहुत खास महत्व है। हर साल ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि पर नारद जयंती मनाई जाती है। इस बार नारद जयंती 2 मई, 2026 शनिवार यानी आज के दिन मनाई जा रही है।

Narad Jayanti Stotram : हिंदू धर्म में  नारद जयंती का बहुत खास महत्व है। हर साल ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि पर नारद जयंती मनाई जाती है। इस बार नारद जयंती 2 मई, 2026 शनिवार यानी आज के दिन मनाई जा रही है। विष्णु जी को प्रसन्न करने के लिए नारद जयंती का दिन बहुत विशेष माना जाता है। इस दिन पूरे विधि-विधान के साथ विष्णु जी की पूजा करने और उनके मंत्रों का जाप करने से उनकी खास कृपा प्राप्त होती है और जीवन में आने वाली हर परेशानी दूर हो जाती है। विष्णु जी के मंत्रों का जाप करने साथ ही श्री नारद स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति को ज्ञान और सुख की प्राप्ति होती है। 

।।श्रीनारद स्तोत्र ।।
उग्रसेन उवाच

कृष्ण प्रवक्ष्यामि त्वामेकं संशयं वद तं मम ॥

योऽयं नाम महाबुद्धिर्नारदो विश्ववन्दितः ।

कस्मादेषोऽतिचपलो वायुवद्भ्रमते जगत् ॥

कलिप्रियश्च कस्माद्वा कस्मात्त्वय्यतिप्रितिमान् ॥

श्रीकृष्ण उवाच

सत्यं राजंस्त्वया पृष्ठमेतत्सर्वं वदामि ते ।

दक्षेण तु पुरा शप्तो नारदो मुनिसत्तमः ॥

सृष्टिमार्गात्सुतान् वीक्ष्य नारदेन विचालितान् ।

नाऽवस्थानं च लोकेषु भ्रमतस्ते भविष्यति ॥

पैशुन्यवक्ता च तथा द्वितियानां प्रचालनात् ।

इति शापद्वयं प्राप्य द्विविधाऽऽत्मजचालनात् ॥

निराकर्तुं समर्थोऽपि मुनिर्मेने तथैव तत् ।

एतावान् साधुवादो हि यतश्च क्षमते स्वयम् ॥

विनाशकालं चाऽवेक्ष्य कलिं वर्धयते यतः ।

सत्यं च वक्ति तस्मात्स न च पापेन लिप्यते ॥

भ्रमतोऽपि च सर्वत्र नाऽस्य यस्मात्पृथङ्मनः ।

ध्येयाद्भवति नैवस्याद्भ्रमदोषस्ततोऽस्य च ॥

यच्च प्रितिर्मयि तस्य परमा तच्छृणुष्व च ॥

अहं हि सर्वदा स्तौमि नारदं देवदर्शनम् ।

महेन्द्रगदितेनैव स्तोत्रेण श‍ृणु तन्नृप ॥

॥ अथ श्रीनारद स्तोत्रम् ॥

श्रुतचारित्रयोर्जातो यस्याऽहन्ता न विद्यते ।

अगुप्तश्रुतचारित्रं नारदं तं नमाम्यहम् ॥

अरतिक्रोधचापल्ये भयं नैतानि यस्य च ।

अदीर्घसूत्रं धीरं च नारदं तं नमाम्यहम् ॥

कामाद्वा यदि वा लोभाद्वाचं यो नाऽन्यथा वदेत् ।

उपास्यं सर्वजन्तूनां नारदं तं नमाम्यहम् ॥

अध्यात्मगतितत्त्वज्ञं क्षान्तं शक्तं जितेन्द्रियम् ।

ऋजुं यथाऽर्थवक्तारं नारदं तं नमाम्यहम् ॥

तेजसा यशसा बुद्‍ध्या नयेन विनयेन च ।

जन्मना तपसा वृद्धं नारदं तं नमाम्यहम् ॥

सुखशीलं सुखं वेषं सुभोजं स्वाचरं शुभम् ।

सुचक्षुषं सुवाक्यञ्च नारदं तं नमाम्यहम् ॥

कल्याणं कुरुते गाढं पापं यस्य न विद्यते ।

न प्रीयते परानर्थे योऽसौ तं नौमि नारदम् ॥

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