स्वामी प्रभुपाद : सब कुछ ईश्वर में स्थित, फिर भी सबसे अलग- समझिए यह रहस्य

Edited By Updated: 11 Jan, 2026 02:35 PM

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जिस प्रकार सर्वत्र प्रवाहमान प्रबल वायु सदैव आकाश में स्थित रहती है, उसी प्रकार समस्त उत्पन्न प्राणियों को मुझमें स्थित जानो। सामान्यजन के लिए यह समझ पाना कठिन है कि इतनी विशाल सृष्टि भगवान पर किस प्रकार आश्रित है किन्तु भगवान उदाहरण प्रस्तुत करते...

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जानोयथाकाशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान्।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय।।9.6।।

अनुवाद एवं तात्पर्य
: जिस प्रकार सर्वत्र प्रवाहमान प्रबल वायु सदैव आकाश में स्थित रहती है, उसी प्रकार समस्त उत्पन्न प्राणियों को मुझमें स्थित जानो। सामान्यजन के लिए यह समझ पाना कठिन है कि इतनी विशाल सृष्टि भगवान पर किस प्रकार आश्रित है किन्तु भगवान उदाहरण प्रस्तुत करते हैं जिससे हमें समझने में सहायता मिले। आकाश हमारी कल्पना के लिए सबसे महान अभिव्यक्ति है और उस आकाश में वायु दृश्य जगत की सबसे महान अभिव्यक्ति है। वायु की गति से प्रत्येक वस्तु की गति प्रभावित होती है किन्तु वायु महान होते हुए भी आकाश के अंतर्गत ही स्थित रहती है, वह आकाश से परे नहीं होती।

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इसी प्रकार समस्त विचित्र दृश्य जगतों का अस्तित्व भगवान की परम इच्छा के फलस्वरूप है और वे सब इस परम इच्छा के अधीन है। जैसा कि हम लोग प्राय: कहते हैं कि उनकी इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता।

इस प्रकार प्रत्येक वस्तु उनकी इच्छा के अधीन गतिशील है, उनकी ही इच्छा से सारी वस्तुएं उत्पन्न होती हैं, उनका पालन होता है और उनका संहार होता है। इतने पर भी वे प्रत्येक वस्तु से उसी तरह पृथक रहते हैं जिस प्रकार वायु के कार्यों से आकाश रहता है।

उपनिषदों में कहा गया है - यदभीता वात: पवते - वायु भगवान के भय से प्रवाहित होती है (तैत्तिरीय उपनिषद् 2.8.1)। वृहदारण्यक उपनिषद् में (3.8.1) कहा गया है- एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गंगा सूर्यचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यौ विधृतौ तिष्ठत:। ‘‘भगवान की अध्यक्षता में परमादेश से चंद्रमा, सूर्य तथा अन्य विशाल लोक घूम रहे हैं।’’

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ब्रह्मसंहिता में (5.52) भी कहा गया है :
युच्चक्षुरेष सविता सकलग्रहाणां,
राजा समस्तसुरमूॢतरशेषतेजा:।
यस्याज्ञया भ्रमति सम्भृतकालचक्रो,
गोविंदमादि पुरुषं तमहं भजामि।।

यह सूर्य की गति का वर्णन है। कहा गया है कि सूर्य भगवान का एक नेत्र है और इसमें ताप तथा प्रकाश फैलाने की अपार शक्ति है। तो भी यह गोविंद की परम इच्छा और आदेश के अनुसार अपनी कक्षा में घूमता रहता है।

अत: हमें वैदिक साहित्य से इसके प्रमाण प्राप्त हैं कि यह विचित्र तथा विशाल लगने वाली भौतिक सृष्टि पूरी तरह भगवान के वश में है। इसकी व्याख्या इसी अध्याय के अगले श्लोकों में की गई है। 

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