स्वामी प्रभुपाद : क्यों मूर्ख करते हैं मनुष्य रूप का उपहास ? गीता के इस श्लोक में छिपा है जीवन का सबसे बड़ा सत्य

Edited By Updated: 05 Mar, 2026 04:26 PM

swami prabhupada

अनुवाद : जब मैं मनुष्य रूप में अवतरित होता हूं तो मूर्ख मेरा उपहास करते हैं। वे मुझ परमेश्वर के दिव्य स्वभाव को नहीं जानते।

परमेश्वर का ‘दिव्य स्वरूप’
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।।9.11।।

Swami Prabhupada

अनुवाद : जब मैं मनुष्य रूप में अवतरित होता हूं तो मूर्ख मेरा उपहास करते हैं। वे मुझ परमेश्वर के दिव्य स्वभाव को नहीं जानते।

तात्पर्य : इस अध्याय के पूर्ववर्ती शल्कों से यह स्पष्ट है कि यद्यपि भगवान मनुष्य रूप में प्रकट होते हैं किन्तु वे सामान्य व्यक्ति नहीं होते। जो भगवान सारे दृश्य जगत का सृजन, पालन तथा संहार करता हो वह मनुष्य नहीं हो सकता। तो भी ऐसे अनेक मूर्ख हैं जो कृष्ण को एक शक्तिशाली पुरुष के अतिरिक्त और कुछ नहीं मानते। वस्तुत: वे आदि परमपुरुष हैं, जैसा कि ब्रह्मसंहिता में प्रमाण स्वरूप कहा गया है- ईश्वर: परम कृष्ण:। वे परम ईश्वर हैं।

Swami Prabhupada

ईश्वर या नियंता अनेक हैं और वे एक-दूसरे से बढ़कर प्रतीत होते हैं। भौतिक जगत में सामान्य प्रबंध कार्यों का कोई न कोई निर्देश होता है, जिसके ऊपर एक सचिव होता है फिर उसके ऊपर मंत्री तथा उससे भी ऊपर राष्ट्रपति होता है। इनमें से हर एक नियंत्रक होता है किन्तु एक-दूसरे के द्वारा नियंत्रित होता है। ब्रह्मसंहिता में कहा गया है कि कृष्ण परम नियंता हैं। नि:संदेह भौतिक जगत तथा वैकुंठलोक दोनों में ही कई-कई निर्देशक होते हैं किन्तु कृष्ण परम नियंता हंै (ईश्वर: परम: कृष्ण:) तथा उनका शरीर सच्चिदानंद रूप अर्थात अभौतिक होता है।

भक्त को समझना चाहिए कि कृष्ण परमात्मा रूप में प्रत्येक जीव के हृदय में विद्यमान हैं, अत: प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर का विकास या मंदिर है, इसलिए जैसे कोई भक्त भगवान के मंदिर का स मान करता है, वैसे ही उसे प्रत्येक जीव का स मान करना चाहिए, जिसमें परमात्मा निवास करता है।  

अनेक निर्विशेषवादी मंदिर पूजा का उपहास करते हैं। वे कहते हैं कि चूंकि भगवान सर्वत्र हैं तो फिर मंदिर पूजा तक ही सीमित क्यों रहें। यदि ईश्वर सर्वत्र हैं तो क्या वे मंदिर या अर्चाविग्रह में नहीं होंगे? यद्यपि सगुणवादी तथा निर्विशेषवादी निरंतर लड़ते रहेंगे किन्तु कृष्णभावनामृत में पूर्ण भक्त यह जानता है कि यद्यपि कृष्ण भगवान हैं किन्तु वे सर्वव्यापी हैं जिसकी पुष्टि ब्रह्मसंहिता में हुई है। वह अपनी शक्ति की विभिन्न अभिव्यक्तियों द्वारा तथा अपने विस्तार द्वारा भौतिक तथा आध्यात्मिक जगत में सर्वत्र विद्यमान रहते हैं।

Swami Prabhupada

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
 

Trending Topics

img title
img title

Be on the top of everything happening around the world.

Try Premium Service.

Subscribe Now!