Swami Prabhupada : डिग्रियों की भीड़ में कहीं पीछे तो नहीं छूट गई आत्म-विद्या ? जानिए क्या है ज्ञान का असली राजा

Edited By Updated: 22 Feb, 2026 04:01 PM

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अनुवाद : यह ज्ञान सब विद्याओं का राजा है, जो समस्त रहस्यों में सर्वाधिक गोपनीय है। यह परम शुद्ध है और चूंकि यह आत्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति कराने वाला है, अत: यह धर्म की परिणति है।

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं ध र्यं कर्तुमव्ययम।। 9.2।।

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अनुवाद : यह ज्ञान सब विद्याओं का राजा है, जो समस्त रहस्यों में सर्वाधिक गोपनीय है। यह परम शुद्ध है और चूंकि यह आत्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति कराने वाला है, अत: यह धर्म की परिणति है। यह अविनाशी है और अत्यंत सुखपूर्वक स पन्न किया जाता है।

तात्पर्य : भगवद्गीता का यह अध्याय विद्याओं का राजा (राजविद्या) कहलाता है क्योंकि यह पूर्ववर्ती व्या यायित समस्त सिद्धांतों एवं दर्शनों का सार है। भारत के प्रमुख दार्शनिक गौतम, कणाद, कपिल, याज्ञवल्क्य, शांडिल्य तथा वैश्वानर हैं। सबसे अंत में व्यासदेव आते हैं जो वेदांतसूत्र के लेखक हैं। अत: दर्शन या दिव्यज्ञान के क्षेत्र में किसी प्रकार का अभाव नहीं है।

अब भगवान कहते हैं कि यह नवम अध्याय ऐसे समस्त ज्ञान का राजा है, यह वेदाध्ययन से प्राप्त ज्ञान एवं विभिन्न दर्शनों का सार है। यह परम गोपनीय (गुह्य) है क्योंकि गुह्य या दिव्यज्ञान में आत्मा तथा शरीर के अंतर को जाना जाता है। समस्त गुह्यज्ञान के इस राजा (राजविद्या) की पराकाष्ठा है, भक्तियोग। सामान्यत: लोगों को इस गुह्यज्ञान की शिक्षा नहीं मिलती। उन्हें बाह्य शिक्षा दी जाती है। जहां तक सामान्य शिक्षा का संबंध है उसमें राजनीति, समाजशास्त्र भौतिकी, रसायनशास्त्र, गणित, ज्योतिॢवज्ञान, इंजीनियरी आदि में मनुष्य व्यस्त रहते हैं।

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विश्वभर में ज्ञान के अनेक विभाग हैं और अनेक बड़े-बड़े विश्वविद्यालय है किंतु दुर्भाग्यवश कोई ऐसा विश्वविद्यालय या शैक्षिक संस्थान नहीं है जहां आत्म-विद्या की शिक्षा दी जाती हो। फिर भी आत्मा शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है, आत्मा के बिना शरीर महत्वहीन है। तो भी लोग आत्मा की ङ्क्षचता न करके जीवन की शारीरिक आवश्यकताओं को अधिक महत्व प्रदान करते हैं।
यह ज्ञान समस्त कार्यों का शुद्धतम रूप है जैसा कि वैदिक साहित्य में बताया गया है। पद्मपुराण में मनुष्य के पापकर्मों का विश£ेषण किया गया है और दिखाया गया है कि ये पापों के फल है। जो लोग सकामकर्मों में लगे हुए हैं वे पापपूर्ण कर्मों के विभिन्न रूपों एवं अवस्थाओं में फंसे रहते हैं।

उदाहरणार्थ जब बीज बोया जाता है तो तुरन्त वृक्ष नहीं तैयार हो जाता, इसमें कुछ समय लगता है। पहले एक छोटा-सा अंकुर रहता है, फिर यह वृक्ष का रूप धारण करता है, तब इसमें फूल आते हैं, फल लगते हैं और फिर बीज बोने वाले व्यक्ति फूल तथा फल का उपभोग कर सकते हैं। 

इसी प्रकार जब कोई मनुष्य पापकर्म करता है तो बीज की ही भांति इसके भी फल मिलने में समय लगता है। इसमें भी कई अवस्थाएं होती हैं। भले ही व्यक्ति में पापकर्मों का उदय होना बंद हो चुका हो किंतु किए गए पापकर्म का फल तब भी मिलता रहता है। कुछ पाप तब भी बीज रूप में बचे रहते हैं, कुछ फलीभूत हो चुके होते हैं, जिन्हें हम दुख तथा वेदना के रूप में अनुभव करते हैं। यहां पर कहा गया है कि भक्ति शाश्वत है। वास्तविक भक्ति तो मुक्ति के बाद भी बनी रहती है। जब भक्त भगवद्धाम को जाता है तो वहां भी वह भगवान की सेवा में रत हो जाता है। वह भगवान से तदाकार नहीं होना चाहता।   

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