Edited By Sarita Thapa,Updated: 07 May, 2026 04:31 PM

अनुवाद : जो वेदों का अध्ययन करते तथा सोमरस का पान करते हैं, वे स्वर्ग प्राप्ति की गवेषणा करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से मेरी पूजा करते हैं। वे पापकर्मों से शुद्ध होकर पवित्र, इंद्र के स्वॢगक धाम में जन्म लेते हैं, जहां वे देवताओं का सा आनंद भोगते हैं।
त्रैविद्या मां सोमपा: पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गगत प्रार्थयन्ते।
ते पुण्यमासाद्य सुरेंद्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्।।9.20।।
अनुवाद : जो वेदों का अध्ययन करते तथा सोमरस का पान करते हैं, वे स्वर्ग प्राप्ति की गवेषणा करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से मेरी पूजा करते हैं। वे पापकर्मों से शुद्ध होकर पवित्र, इंद्र के स्वॢगक धाम में जन्म लेते हैं, जहां वे देवताओं का सा आनंद भोगते हैं।
तात्पर्य : त्रैविद्या: शब्द तीन वेदों-साम, यजु: तथा ऋग्वेद - बताने वाला है। जिस ब्राह्मण ने इन तीनों वेदों का अध्ययन किया है वह त्रिवेदी कहलाता है।

जो इन तीनों वेदों से प्राप्त ज्ञान के प्रति आसक्त रहता है, उसका समाज में आदर होता है। दुर्भाग्यवश वेदों के ऐसे अनेक पंडित हैं जो उनके अध्ययन के चरमलक्ष्य को नहीं समझते इसीलिए कृष्ण अपने को त्रिवेदियों के लिए परमलक्ष्य घोषित करते हैं। वास्तविक त्रिवेदी भगवान के चरणकमलों की शरण ग्रहण करते हैं और भगवान को प्रसन्न करने के लिए उनकी शुद्धभक्ति करते हैं। भक्ति का सूत्रपात हरे कृष्ण मंत्र के कीर्तन तथा साथ-साथ कृष्ण को वास्तव में समझने के प्रयास से होता है।
दुर्भाग्यवश जो लोग वेदों के नाममात्र के छात्र हैं, वे इंद्र तथा चंद्र जैसे विभिन्न देवों को आहूति प्रदान करने में रुचि लेते हैं। ऐसे प्रयत्न से विभिन्न देवों के उपासक निश्चित रूप से प्रकृति के नि न गुणों के कल्मष से शुद्ध हो जाते हैं। फलस्वरूप वे उच्चतर लोकों, यथा महालोक, जनोलोक, तपोलोक आदि को प्राप्त होते हैं। एक बार इन उच्च लोकों में पहुंच कर वहां इस लोक की तुलना में लाखों गुना अच्छी तरह इंद्रियों की तुष्टि की जा सकती है।

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