Edited By Sarita Thapa,Updated: 05 Jan, 2026 03:19 PM

भारतीय परंपराओं और ज्योतिष शास्त्र में संतान को लेकर कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। अक्सर समाज में यह सवाल उठता है कि क्या इकलौती संतान होना किसी दोष या अशुभता का संकेत है।
भारतीय परंपराओं और ज्योतिष शास्त्र में संतान को लेकर कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। अक्सर समाज में यह सवाल उठता है कि क्या इकलौती संतान होना किसी दोष या अशुभता का संकेत है। आज के दौर में जहां हम दो हमारा एक का चलन बढ़ा है, वहीं ज्योतिषीय दृष्टिकोण से इसे समझना बहुत जरूरी है। तो आइए जानते हैं कि इस बारे में शास्त्र क्या कहते हैं और किन ग्रहों की वजह से ऐसी स्थिति बनती है।
क्या इकलौती संतान होना अशुभ है?
सबसे पहले इस भ्रम को दूर करना आवश्यक है कि इकलौती संतान होना अशुभ होता है। ज्योतिष शास्त्र में इसे एक संतान योग कहा जाता है। यह कोई दोष नहीं, बल्कि व्यक्ति के भाग्य और संचित कर्मों का फल है। कई बार कुंडली में पितृ दोष या अन्य ग्रह बाधाओं के कारण दूसरी संतान में देरी होती है, जिसे लोग गलती से अशुभ मान लेते हैं। ज्योतिष के अनुसार, इकलौती संतान को माता-पिता का पूरा स्नेह, सुरक्षा और आर्थिक संसाधन मिलते हैं, जिससे वे जीवन में अधिक आत्मविश्वासी और सफल होते हैं।

कुंडली में एक संतान योग बनने के ज्योतिषीय कारण
ज्योतिष में कुंडली का पांचवां घर संतान का सुख तय करता है। जब इस भाव पर विशिष्ट ग्रहों का प्रभाव होता है, तो केवल एक संतान की प्राप्ति होती है।
देवगुरु बृहस्पति का प्रभाव
गुरु को संतान का कारक माना जाता है। यदि गुरु अपनी ही राशि (धनु या मीन) में होकर पांचवें भाव में बैठा हो, तो 'कारक भावनाशाय' सिद्धांत के अनुसार कभी-कभी व्यक्ति को केवल एक ही उत्तम संतान प्राप्त होती है।
सूर्य की उपस्थिति
सूर्य को एक 'अग्नि तत्व' और सीमित फल देने वाला ग्रह माना जाता है। यदि पंचम भाव में सूर्य प्रबल हो, तो अक्सर एक ही संतान का सुख मिलता है।
शनि और मंगल की दृष्टि
यदि पांचवें भाव पर शनि की ठंडी या मंगल की तीक्ष्ण दृष्टि हो, तो यह दूसरी संतान के योग को बाधित कर सकती है।
पंचमेश का निर्बल होना
यदि पांचवें घर का स्वामी छठे, आठवें या बारहवें भाव में जाकर बैठ जाए, तो वंश वृद्धि में कठिनाई आती है और व्यक्ति को एक ही संतान से संतोष करना पड़ता है।
वंश वृद्धि और ज्योतिषीय उपाय
भगवान कृष्ण के बाल रूप की सेवा और संतान गोपाल मंत्र का जाप सबसे प्रभावशाली माना जाता है। कुंडली में गुरु की स्थिति सुधारने के लिए गुरुवार को पीली वस्तुओं का दान करें और बड़ों का आशीर्वाद लें। ऐसी मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक हरिवंश पुराण का श्रवण या पाठ करने से संतान संबंधी बाधाएं दूर होती हैं।

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