क्या है स्वास्तिक का महत्व, दिशाओं से क्या है इसका संबंध?

Edited By Updated: 10 Oct, 2020 05:12 PM

what is the significance of the swastika

सनातन धर्म में किसी भी मांगलिक कार्य को करने से पहले कई तरह नियम आदि अपनाए जाते हैं, जिन्हें अपनाना बहुत आवश्यक माना जाता है। कहा जाता है इन नियमों को न अपनाने से जो भी धार्मिक या मांगलिक कार्य किया जाता है

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सनातन धर्म में किसी भी मांगलिक कार्य को करने से पहले कई तरह नियम आदि अपनाए जाते हैं, जिन्हें अपनाना बहुत आवश्यक माना जाता है। कहा जाता है इन नियमों को न अपनाने से जो भी धार्मिक या मांगलिक कार्य किया जाता है उसका फल शुभ की जगह अशुभ हो जाता है। यही कारण है ज्योतिषी कहते हैं सनातन धर्म में होने वाली प्रत्येक पूजा आदि में इन नियमों को अपनाना अनिवार्य होता है। आज हम इन्हीं नियमों में से एक के बारें में हम आपको बताने वाले हैं। 
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आप में से बहुत से लोगों ने देखा होगा कि सनातन धर्म में किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य को शुरू करने से पहले स्वास्तिक चिन्ह बनाया जाता है। अगर प्रचलित मान्यताओं की मानें तो इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है। बल्कि कहा जाता ये चिन्ह मंगल करने वाला यानि हित करने वाला माना जाता है। मगर क्या आप जानते हैं कि इसे हिंदू धर्म के अलावा अन्य धर्मों में भी खास माना जाता है। जी हां, इससे से जुड़ी किंवदंतियों के अनुसार न केवल सनातन धर्म में ही नहीं, अपितु अन्य धर्मों में भी बहुत ही परम माना जाता है। तो चलिए इससे जुड़ी अन्य जानकारी जानते हैं कि आखिर क्या मांगलिक कार्यों में स्वास्तिक बनाना इतना ज़रूरी होता है।
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दरअसल शास्त्रों में इससे जुड़ी कई मान्यताएं दी गई हैं। जिसके अनुसार स्वास्तिक जिसे सातिया भी कहा जाता है, वो भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र का प्रतीक भी माना जाता है। इसलिए कहा जाता है कि स्वस्तिवाचन हुए बिना हिन्दुओं का कोई भी शुभ कार्य संपन्न नहीं होता। शास्त्रों में इसे सत्य, शाश्वत, शांति, अनंतदिव्य, ऐश्वर्य तथा सौंदर्य का मांगलित चिन्ह तथा प्रतीक है, जो बहुत शुभ माना गया है। कहा जाता है यह धनात्मक या प्लस को भी इंगित करता है, जो सम्पन्नता का प्रतीक है। इसके चारों ओर लगाए गए बिंदुओं को चार दिशाओं का प्रतीक होता है। 

धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक स्वास्तिक बनाने के दौरान उसकी चार भुजाएं समानांतर रहती हैं और इन चारों भुजाओं का बड़ा धार्मिक महत्व है। इससे जुड़ी अन्य मान्यताओं के अनुसार यह चार वेदों के अलावा, चार पुरुषार्थ जिनमें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष शामिल है, का भी प्रतीक माना जाता है। तो वहीं अगर गणेश पुराण की बात करें तो उसमें कहा गया कि स्वास्तिक गणेश जी का ही एक रूप है, यही कारण है प्रत्येक शुभ, मांगलिक और कल्याणकारी कार्य का प्रारंभ इसे बनाकर यानि स्वास्तिक बनाकर ही की जाती है। 
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इसमें व्यक्ति के जीवन में आने वाले समस्त प्रकार के विघ्नों को दूर करने में, तथा व्यक्ति के जीवन से अमंगल दूर को करने की शक्ति होती है। इन सभी मान्यताओं के अलावा ये भी कहा जाता है कि स्वास्तिक का चिन्ह भगवान श्री राम, श्री कृष्ण के पैरों तथा भगवान बुद्ध के ह्रदय पर अंकित है।  

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