Love Lottery Review: प्यार, शक और कत्ल की उलझी कहानी में अक्षय ओबेरॉय का दमदार अंदाज

Edited By Updated: 24 Sep, 2026 01:19 PM

love lottery movie review in hindi

यहां पढ़ें कैसी है फिल्म लव लॉटरी

मूवी रिव्यू: लव लॉटरी (Love Lottery)
कलाकार: अक्षय ओबेरॉय (Akshay Oberoi), हेली दारूवाला (Haley Daruwala), अग्नि अग्यारी (Agni Agyari), कबीर दुहन सिंह (Kabir Duhan Singh), विजयंत कोहली (Vijayant Kohli), विक्रम शर्मा (Vikram Sharma) 
निर्देशक: अरविंद पांडे (Arvind Pandey)

रेटिंग: 3*

Love Lottery: रिश्ते की नींव अगर भरोसे पर टिकी हो तो जिंदगी आसान लगती है, लेकिन जब यही भरोसा शक में बदल जाए तो छोटी-सी बात भी बड़ी परेशानी का कारण बन सकती है। लव लॉटरी इसी बदलते रिश्ते को एक क्राइम मिस्ट्री के साथ जोड़ती है। अरविंद पांडे के निर्देशन में बनी यह फिल्म एक शादीशुदा कपल की कहानी से शुरू होकर हत्या की जांच और फिर कोर्टरूम की बहस तक पहुंचती है। फिल्म का फोकस सिर्फ कातिल की पहचान पर नहीं है, बल्कि यह भी समझने की कोशिश करता है कि किसी रिश्ते में पैदा हुआ संदेह किस तरह हालात को पूरी तरह बदल सकता है।

कहानी
फिल्म की कहानी कार्तिक सक्सेना (अक्षय ओबेरॉय) और भरनी वर्मा (हेली दारूवाला) के इर्द-गिर्द बुनी गई है। शुरुआत में दोनों के रिश्ते में अपनापन नजर आता है, लेकिन समय के साथ उनके बीच तनाव बढ़ने लगता है। आपसी मतभेद और शक उनके रिश्ते को ऐसे मोड़ पर ले जाते हैं, जहां भरनी की हत्या हो जाती है।

भरनी की मौत के बाद जांच की दिशा तेजी से कार्तिक की तरफ मुड़ती है। पुलिस को ऐसे कई संकेत मिलते हैं, जो उसे शक के घेरे में खड़ा करते हैं। पुराने विवाद और रिश्ते से जुड़े पहलू भी उसके खिलाफ जाते दिखाई देते हैं। दूसरी तरफ कार्तिक लगातार खुद को बेगुनाह बताता रहता है।

यहीं से फिल्म असली खेल शुरू करती है। दर्शक के सामने सवाल रहता है कि आखिर कार्तिक की बात पर भरोसा किया जाए या फिर परिस्थितिजन्य सबूतों को सच माना जाए। फिल्म कई मौकों पर कहानी को इस तरह मोड़ती है कि एक जवाब मिलने के बजाय नया सवाल खड़ा हो जाता है।

आगे बढ़ते हुए कहानी में रिश्ते के पुराने राज, पुलिस इन्वेस्टिगेशन और कानूनी लड़ाई सामने आती है। कोर्टरूम के हिस्से कहानी को एक अलग दिशा देते हैं और दर्शक लगातार यह अनुमान लगाने की कोशिश करता रहता है कि असली सच आखिर क्या है।

अभिनय
अक्षय ओबेरॉय ने कार्तिक के किरदार को संभालने में अच्छा काम किया है। उनके किरदार में एक साथ कई तरह की भावनाएं दिखाई देती हैं। कहीं वह अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए परेशान नजर आते हैं, तो कहीं उनके व्यवहार से खुद उनके बारे में सवाल खड़े होते हैं। यही अनिश्चितता उनके प्रदर्शन को दिलचस्प बनाती है।

हेली दारूवाला ने भरनी के रोल में कहानी को जरूरी आधार दिया है। उनका किरदार सिर्फ हत्या का शिकार हुई महिला तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके अतीत और रिश्ते से जुड़े कई सवाल पूरी कहानी को प्रभावित करते हैं।

कबीर दुहन सिंह इंस्पेक्टर विक्रम बिष्ट की भूमिका में अपने सख्त और पूछताछ वाले अंदाज से प्रभावित करते हैं। जांच से जुड़े दृश्यों में उनका किरदार कहानी को आगे बढ़ाता है।

वहीं विक्रम शर्मा एडवोकेट प्रशांत बत्रा के किरदार में कोर्टरूम सीक्वेंस में प्रभाव छोड़ते हैं। विजयंत कोहली का अभिनय सहज है और अग्नि अग्यारी कम स्क्रीन टाइम में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराती हैं। बाकी कलाकार भी अपनी-अपनी भूमिकाओं में कहानी को सपोर्ट करते हैं।

निर्देशन और स्क्रीनप्ले
अंकुर खत्री का स्क्रीनप्ले फिल्म को सिर्फ एक पारंपरिक मर्डर मिस्ट्री बनने से बचाने की कोशिश करता है। कहानी में अपराध की जांच के साथ-साथ पति-पत्नी के रिश्ते की उलझनों को भी पर्याप्त जगह दी गई है। फिल्म का एक ट्रैक हत्या की सच्चाई तक पहुंचने की कोशिश करता है, जबकि दूसरा कार्तिक और भरनी के रिश्ते में आई दरारों को समझाता है। दोनों पहलुओं को साथ लेकर चलने की वजह से कहानी में सिर्फ क्राइम ही नहीं, बल्कि रिश्तों का एंगल भी बना रहता है।

निर्देशक अरविंद पांडे ने सस्पेंस को आखिरी हिस्से तक बनाए रखने की कोशिश की है। पुलिस जांच से लेकर अदालत में होने वाली बहस तक, फिल्म लगातार दर्शक को कहानी से जोड़े रखने का प्रयास करती है। हालांकि, कुछ हिस्सों में कहानी की गति थोड़ी कम हो जाती है। अगर इन दृश्यों को थोड़ा और टाइट किया जाता, तो फिल्म का असर ज्यादा मजबूत हो सकता था। फिर भी फिल्म का मुख्य रहस्य अपनी पकड़ बनाए रखता है।

म्यूजिक और तकनीकी पक्ष
अरविंद पांडे और वरुण मिश्रा का संगीत फिल्म के माहौल के अनुरूप है। ‘नजर लग जाएगी’ और ‘बेवफा’ जैसे गाने कहानी के इमोशनल हिस्सों को आगे बढ़ाते हैं और जबरन अलग से जोड़े हुए महसूस नहीं होते।

नवीन वी. मिश्रा की सिनेमैटोग्राफी फिल्म को विजुअली मजबूत बनाती है। उत्तराखंड की खूबसूरत लोकेशंस सिर्फ बैकग्राउंड का काम नहीं करतीं, बल्कि फिल्म के माहौल और कहानी के मूड को भी स्थापित करती हैं। एडिटिंग की जिम्मेदारी प्रकाश झा ने संभाली है। जांच और कोर्टरूम के बीच कहानी को आगे ले जाने में एडिटिंग मदद करती है। करीब 2 घंटे 21 मिनट लंबी फिल्म होने के बावजूद इसे बहुत ज्यादा खिंचा हुआ महसूस कराने से बचने की कोशिश की गई है।

Related Story

    Trending Topics

    img title
    img title

    Be on the top of everything happening around the world.

    Try Premium Service.

    Subscribe Now!