Edited By Niyati Bhandari,Updated: 09 Oct, 2026 12:53 PM

Shanishchari Amavasya 2026: 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या और शनिश्चरी अमावस्या का दुर्लभ संयोग बन रहा है। जानिए शुभ मुहूर्त, तर्पण विधि और पितृ दोष व शनि प्रकोप से मुक्ति के अचूक ज्योतिषीय उपाय।
Sarvapitri Amavasya 2026: हिंदू धर्मशास्त्रों में आश्विन मास की अमावस्या तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। इस बार 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के साथ शनिश्चरी अमावस्या का बेहद शुभ एवं दुर्लभ संयोग बनने जा रहा है। आश्विन अमावस्या के दिन ही 15 दिनों से चला आ रहा पितृ पक्ष समाप्त हो जाता है। शनिवार के दिन अमावस्या पड़ने के कारण इस दिन पितरों का तर्पण करने के साथ-साथ शनिदेव की विशेष कृपा प्राप्त करने का भी उत्तम अवसर है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, इस दुर्लभ अवसर पर श्राद्ध, तर्पण और दान-पुण्य करने से शनि ग्रह के दुष्प्रभावों से राहत मिलती है और पितर प्रसन्न होकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

सर्वपितृ अमावस्या 2026: तिथि और शुभ समय
अमावस्या तिथि का प्रारंभ: 9 अक्टूबर 2026 को रात 9:35 बजे
अमावस्या तिथि का समापन: 10 अक्टूबर 2026 को रात 9:19 बजे
उदया तिथि के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या: 10 अक्टूबर 2026
वंशज अपने पुरखों को उनकी मृत्यु के उपरांत भुला न दें, इसलिए शास्त्रों ने पूर्वजों का श्राद्ध करने का विशिष्ट विधान बताया है। शास्त्रनुसार सर्वपितृ अमावस्या पितृगणों को विदा करने की अंतिम दिन है। शास्त्र ऐसा कहते हैं की सोलह दिन तक पितृ अपने वंशज के घर में विराजते हैं और अपने वंशज से तर्पण, पिंड व श्राद्ध के रूप में जल, अन्न वस्त्र की उम्मीद रखते हैं। सर्वपितृ अमावस्या के दिन सभी पितृगण पुनः अपने लोक लौट जाते हैं। ऐसे में अगर पितृपक्ष के 16 दिनों में जो वंशज श्राद्ध नहीं करता है तो पितृ उससे नाराज़ होकर श्राप देकर लौट जाते हैं। सर्वपितृ अमावस्या पर उन सभी पूर्वजों का श्राद्धकर्म कर सकते हैं, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात न हो या जिनका श्राद्ध करना पूर्व 15 दिनों में संभव न हो पाया हो।
ऐसे करें पितृगणों को विदा: श्राद्धकर्ता दक्षिणमुखी होकर हाथ में तिल, त्रिकुश व जल लेकर यथा विधि संकल्प कर पंचबलि देकर दानपूर्वक ब्राह्मण को भोजन कराएं। पंचबलि का अर्थ है पांच अलग-अलग तरह के दान कर्म जो श्राद्धकर्ता पितृगणों के निमित कर्ता है। पितृ के निमित पंच बलिदान इस प्रकार हैं-
पिपीलाकादि बलि: यह दान पितृ के निमित पीपल के पेड़ में रहने वाले कीटों को दिया जाता है। सव्य होकर 'पिपीलिका कीट पतंगकाया' मंत्र बोलते हुए थाली में सभी पकवान परोस कर अपसभ्य व दक्षिणाभिमुख होकर निम्न संकल्प करें- 'अद्याऽमुक अमुक शर्मा वर्मा, गुप्तोऽहमूक गोत्रस्य मम पितु: मातु: महालय श्राद्धे सर्वपितृ विसर्जनामावा स्यायां अक्षयतृप्त र्थमिदमन्नं तस्मै। तस्यै वा स्वधा।'
गो-बलि: यह दान पितृ के निमित गाय को दिया जाता है। भोजन को पत्ते पर रखकर मंडल के बाहर पश्चिम की ओर 'ॐ सौरभेय्य: सर्वहिता:' मंत्र पढ़ते हुए गो-बलि पत्ते पर दें तथा 'इदं गोभ्यो न मम्' ऐसा कहें।
श्वान-बलि: यह दान पितृ के निमित कुत्ते को दिया जाता है। भोजन को पत्ते पर रखकर यज्ञोपवीत को कंठी कर 'द्वौ श्वानौ श्याम शबलौ' मंत्र पढ़ते हुए कुत्तों को दान दें 'इदं श्वभ्यां न मम्' ऐसा कहें।
काक बलि: यह दान पितृ के निमित कौवे को दिया जाता है। अपसव्य होकर 'ॐ ऐद्रेवारुण वायण्या' मंत्र पढ़कर कौवों को भूमि पर अन्न दें। साथ ही इस मंत्र को बोलें–'इदं वायसेभ्यो न मम्'।
देवादि बलि: यह दान पितृ के निमित देवताओं को दिया जाता है। सव्य होकर 'ॐ देवा: मनुष्या: पशवो' मंत्र बोलेते हुए देवादि के लिए अन्न दें तथा 'इदमन्नं देवादिभ्यो न मम्' कहें।

संध्या काल का विशेष उपाय: दक्षिण दिशा में जलाएं चौमुखी दीपक
शास्त्रों में दक्षिण दिशा को यमराज और पितरों की दिशा माना गया है। सर्वपितृ अमावस्या की शाम को अपने घर के मुख्य द्वार पर सरसों के तेल का चार बत्तियों वाला (चौमुखी) दीपक जलाएं। दीपक की लौ दक्षिण दिशा की ओर रखें तथा हाथ जोड़कर पितरों को भावभीनी विदाई दें और जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए क्षमा याचना करें।
शनि अमावस्या पर करें ये उपाय
शनि अमावस्या पर काले रंग के वस्त्र धारण करें। तुलसी के 108 पत्ते लेकर उन पर श्री राम लिखें और पत्तों को एक सूत्र में पिरो कर माला बना कर हनुमान जी के गले में डालें। शनि देव का पूजन और तैलाभिषेक कर शनि की साढेसाती, ढैय्या और महादशा जनित संकट और आपदाओं से मुक्ति पा सकते हैं।
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्ति के लिए सवा मीटर काले वस्त्र में ये चीजें बांध कर वास्तविक डकौत को दें- काले जूते या चप्पल, सवा किलो काले साबुत उड़द, सवा किलो काले तिल, सवा लीटर सरसों का तेल, एक चाकू, 8 काले गुलाब जामुन, काले या नीले फूल।
