Edited By Mansi,Updated: 05 Sep, 2026 05:58 PM
‘राज़ी’ से ‘सैम बहादुर’ तक मेघना गुलजार ने अलग अंदाज में कहानियां पेश की हैं। ‘दायरा’ से पहले जानिए उनके सिनेमा की 5 खास खूबियां।
नई दिल्ली/टीम डिजिटल। कुछ निर्देशक अपनी फिल्मों से पहचाने जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जिनकी हर फिल्म उनके फिल्ममेकिंग स्टाइल की पहचान बन जाती है। मेघना गुलजार इसी दूसरी श्रेणी की फिल्ममेकर हैं। उन्होंने कभी जासूसी की कहानी कही, कभी एक चर्चित आपराधिक मामले की परतें खोलीं और कभी देश के एक महान सैन्य अधिकारी की जिंदगी को पर्दे पर उतारा। लेकिन इन तमाम कहानियों के बीच एक चीज लगातार दिखाई देती है बड़ी घटनाओं के पीछे छिपे आम इंसान को तलाशने की कोशिश।
‘तलवार’, ‘राज़ी’, ‘छपाक’ और ‘सैम बहादुर’ जैसी फिल्मों के जरिए मेघना ने यह साबित किया है कि संवेदनशील विषयों को प्रभावशाली बनाने के लिए हमेशा तेज ड्रामा या सनसनी की जरूरत नहीं होती। उनकी कहानियां धीरे-धीरे अपना असर छोड़ती हैं और दर्शक को फिल्म खत्म होने के बाद भी उसके बारे में सोचने पर मजबूर करती हैं।
अब उनकी अगली फिल्म ‘दायरा’ में क्राइम, पुलिसिंग और न्याय का जटिल सवाल सामने आने वाला है। फिल्म में करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन अहम भूमिकाओं में हैं। जंगल पिक्चर्स और पेन स्टूडियोज द्वारा निर्मित यह फिल्म सच्ची घटनाओं से प्रेरित बताई गई है और 18 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होगी।
तो आखिर मेघना गुलजार की फिल्मों में ऐसा क्या है, जो उन्हें बाकी फिल्ममेकर्स से अलग करता है? इसकी पांच बड़ी वजहें समझिए।
1. खबर खत्म होती है, मेघना की कहानी वहीं से शुरू होती है
किसी बड़ी घटना की खबर सामने आती है तो उसमें तारीख, जगह, आरोपी, पीड़ित और घटना का विवरण होता है। लेकिन मेघना गुलजार की दिलचस्पी अक्सर उस खबर के आगे की दुनिया में दिखाई देती है। ‘तलवार’ में एक हाई-प्रोफाइल क्राइम केस को सिर्फ पुलिस जांच की कहानी नहीं बनाया गया। फिल्म ने अलग-अलग संभावनाओं और जांच के नजरियों के जरिए दर्शक को यह सोचने पर मजबूर किया कि सच आखिर किसके पास है।
‘राज़ी’ में जासूसी मिशन के पीछे एक बेटी, पत्नी और परिवार से जुड़ी भावनाएं थीं। ‘छपाक’ में एसिड अटैक को केवल अपराध के रूप में देखने के बजाय पीड़िता की उस जिंदगी को केंद्र में रखा गया, जो घटना के बाद भी जारी रहती है।
‘सैम बहादुर’ में भी सैन्य इतिहास से आगे बढ़कर उस व्यक्तित्व को समझने की कोशिश की गई, जो वर्दी के पीछे मौजूद था। यही नजरिया ‘दायरा’ में भी महत्वपूर्ण हो सकता है। यहां अपराध सिर्फ कहानी की शुरुआत है, जबकि उसके बाद पुलिस, न्याय और फैसलों की पूरी प्रक्रिया सवालों के घेरे में आती दिखाई देती है।
2. सनसनी नहीं, कहानी का असर ज्यादा जरूरी है
क्राइम और जस्टिस पर फिल्म बनाते समय दर्शकों को बांधे रखने के लिए हिंसा और सनसनी का सहारा लेना आसान रास्ता है। मेघना गुलजार का सिनेमा अक्सर इसके बजाय संयम का रास्ता चुनता है। उनकी फिल्मों में घटनाओं का प्रभाव केवल इसलिए नहीं आता कि पर्दे पर कुछ चौंकाने वाला दिखाया गया है। असली असर किरदारों के फैसलों और उनके परिणामों से पैदा होता है।
‘राज़ी’ में मिशन से ज्यादा महत्वपूर्ण बन जाता है कि उसके लिए सहमत को व्यक्तिगत स्तर पर क्या कीमत चुकानी पड़ रही है। ‘तलवार’ में असमंजस और सवाल कहानी को आगे बढ़ाते हैं। ‘दायरा’ भी इसी सोच को आगे ले जाती नजर आती है। फिल्म में एक तरफ अपराध और उससे पैदा हुआ आक्रोश है, तो दूसरी तरफ कानून की प्रक्रिया और न्याय व्यवस्था का सवाल। यही टकराव कहानी को सिर्फ एक क्राइम ड्रामा से आगे ले जा सकता है।
3. गुलजार के शब्दों से मिलता है कहानियों को अलग भावनात्मक रंग
मेघना गुलजार के सिनेमा की चर्चा संगीत के बिना अधूरी लगती है। उनके पिता गुलजार के लिखे गीत कई बार फिल्मों के सिर्फ गाने नहीं रहते, बल्कि कहानी की भावनाओं को व्यक्त करने का जरिया बन जाते हैं। ‘राज़ी’ का ‘दिलबरो’ इसका सबसे मजबूत उदाहरण है। एक बेटी के घर से दूर जाने के पल को गीत ने जिस भावनात्मक तरीके से पेश किया, उसने उस दृश्य को फिल्म के यादगार हिस्सों में बदल दिया।
इसी तरह ‘छपाक’ का संगीत भी फिल्म के विषय और उसकी भावनात्मक यात्रा से जुड़ा हुआ महसूस होता है। मेघना की फिल्मों में संगीत कहानी को रोककर नहीं आता, बल्कि उसके साथ चलता है। रिश्तों, दर्द, उम्मीद और संघर्ष को शब्द और धुन एक अतिरिक्त भावनात्मक गहराई देते हैं।
4. फिल्म खत्म होने के बाद भी कहानी दिमाग में चलती रहती है
मेघना गुलजार की फिल्मों की एक खासियत यह भी है कि वे दर्शक को हर सवाल का आसान जवाब देने की कोशिश नहीं करतीं। ‘तलवार’ देखने के बाद सवाल सिर्फ यह नहीं रह जाता कि अपराध किसने किया, बल्कि यह भी सामने आता है कि अलग-अलग जांच और परिस्थितियों के बीच सच को समझना कितना मुश्किल हो सकता है।
‘राज़ी’ देशभक्ति की कहानी है, लेकिन उसका भावनात्मक केंद्र परिवार और त्याग है। ‘छपाक’ सामाजिक मुद्दे को एक महिला की व्यक्तिगत यात्रा के जरिए देखती है। वहीं ‘सैम बहादुर’ इतिहास के एक बड़े नाम को इंसानी नजरिए से समझने की कोशिश करती है। ‘दायरा’ में भी सवाल शायद उतना ही महत्वपूर्ण होगा जितना उसका जवाब। जब कोई अपराध समाज में गुस्सा पैदा करता है, तब न्याय कितनी तेजी से होना चाहिए? क्या भावनाएं कानून की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं? और पुलिस के सामने सही फैसला लेने की जिम्मेदारी कितनी मुश्किल होती है?
अगर फिल्म दर्शकों को इन सवालों के साथ थिएटर से बाहर लेकर आती है, तो यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
5. बड़े सितारों को स्टार नहीं, किरदार बना देती हैं मेघना
मेघना गुलजार की कास्टिंग का एक दिलचस्प पहलू यह रहा है कि उनके साथ काम करने वाले बड़े कलाकार अक्सर अपने स्टारडम से ज्यादा किरदार के लिए याद किए जाते हैं।
‘राज़ी’ में आलिया भट्ट की पहचान सहमत के किरदार में बदल गई। ‘छपाक’ में दीपिका पादुकोण का पूरा ग्लैमरस स्टार इमेज पीछे छूट गया और मालती की जिंदगी कहानी का केंद्र बन गई।
‘सैम बहादुर’ में विक्की कौशल ने सैम मानेकशॉ की शख्सियत को सिर्फ कॉस्ट्यूम और लुक के जरिए नहीं, बल्कि उनके अंदाज और व्यक्तित्व के जरिए पर्दे पर उतारने की कोशिश की।
अब ‘दायरा’ में करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की भूमिका में दिखाई देंगे। दोनों किरदार न्याय और पुलिसिंग को लेकर अलग नजरिया रखते हैं। ऐसे में फिल्म की असली चुनौती सिर्फ क्राइम को सुलझाना नहीं, बल्कि इन दोनों विचारधाराओं के टकराव को प्रभावी तरीके से पेश करना भी होगी।