Exclusive Interview: हमारा उद्देश्य बहस छेड़ना नहीं, तथ्यों को लोगों तक पहुंचाना है- चंद्रचूड़ घोष

Edited By Updated: 05 Aug, 2026 12:21 PM

the bose files cast and director exclusive interview with punjab kesari

इस फिल्म को लेकर राजेश गुप्ता, यतिन कार्येकर, चंद्रचूड़ घोष और अनुज धर ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। सुभाष चंद्र बोस को तो हम सब जानते हैं।  वह व्यक्ति जिन्होंने हमारे देश के लिए काफी कुछ किया। हम सभी यह जानते थे कि उनकी मौत प्लेन क्रैश में हुई थी लेकिन अब उनकी मौत को लेकर कंट्रोवर्सी शुरू हो गई है। अब इसी तथ्य को लेकर एक फिल्म आ रही है जिसका नाम है द बोस फाइल्स।  इस फिल्म को राजेश गु्प्ता ने डायरेक्ट किया है।  वहीं इस फिल्म में यतिन कार्येकर, अखिलेंद्र मिश्रा, अपूर्व अरोड़ा, वीरेंद्र सक्सेना मुख्य भूमिका में नजर आने वाले हैं। इस फिल्म को लेकर राजेश गुप्ता, यतिन कार्येकर, चंद्रचूड़ घोष और अनुज धर ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश... 
 

राजेश गुप्ता
प्रश्न: ‘द बोस फाइल्स’ की शुरुआत कैसे हुई और यह फिल्म किस सच को सामने लाने की कोशिश करती है?

उत्तर: इससे पहले नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन पर हिंदी में दो प्रमुख फिल्में बन चुकी हैं। पहली वर्ष 2004 में श्याम बेनेगल के निर्देशन में आई थी, जबकि दूसरी फिल्म में राजकुमार राव मुख्य भूमिका में नजर आए थे। इन दोनों फिल्मों की कहानी 1920 के दशक से शुरू होकर 1945 में हुई कथित विमान दुर्घटना तक सीमित रहती है। हमारी फिल्म की कहानी वहीं से शुरू होती है जहां ये फिल्में समाप्त होती हैं। हमारा मूल सवाल यही है कि यदि विमान दुर्घटना हुई ही नहीं थी तो उसके बाद नेताजी के जीवन में क्या हुआ? आखिर 1945 के बाद वे कहां गए, किन परिस्थितियों में रहे और उनके साथ वास्तव में क्या हुआ? यही रहस्य हमारी फिल्म का केंद्र है। पिछले लगभग 78 वर्षों से करोड़ों भारतीयों के मन में यही सवाल बना हुआ है और हमारी फिल्म उसी अनसुलझे अध्याय को सामने लाने का प्रयास करती है।

इस फिल्म की कहानी लेखक और शोधकर्ता अनुज धर तथा चंद्रचूड़ घोष के दो दशकों से अधिक लंबे शोध, दस्तावेजों और प्रकाशित पुस्तकों पर आधारित है। फिल्म में 1945 के बाद की घटनाओं के साथ-साथ उस दौर में विभिन्न सरकारों, खुफिया एजेंसियों और प्रशासन की भूमिका से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं को भी उठाया गया है। हमारा उद्देश्य किसी निष्कर्ष को थोपना नहीं, बल्कि उपलब्ध तथ्यों और शोध के आधार पर उन सवालों को दर्शकों के सामने रखना है, जिन पर लंबे समय से चर्चा होती रही है। मेरा मानना है कि इतिहास से जुड़े प्रमाण और तथ्य समय रहते देश के सामने आने चाहिए। आज की युवा पीढ़ी नेताजी के संघर्ष और योगदान के केवल कुछ प्रसिद्ध पहलुओं से परिचित है, जबकि उनके जीवन के कई महत्वपूर्ण अध्याय अब भी व्यापक रूप से लोगों तक नहीं पहुंच पाए हैं। हमारी कोशिश उसी छिपे हुए इतिहास को एक सिनेमाई माध्यम के जरिए दर्शकों के सामने लाने की है।


प्रश्न: आखिर ऐसा क्या कारण रहा कि यह सच्चाई इतने वर्षों तक सामने नहीं आ सकी?

उत्तर: इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं। राजनीतिक कारण भी हैं, अंतरराष्ट्रीय संबंधों से जुड़े कारण भी हैं। कई लोगों का मानना रहा कि यदि कुछ तथ्य सामने आए तो दूसरे देशों के साथ रिश्तों पर असर पड़ सकता है। लेकिन मेरी व्यक्तिगत राय है कि अगर इतने वर्षों बाद भी सच को छिपाया जाए तो उसका कोई औचित्य नहीं बचता। अब समय आ गया है कि देश के सामने तथ्य रखे जाएं। हम किसी पर आरोप लगाने नहीं आए हैं। हमारी कोशिश केवल इतनी है कि जिन दस्तावेजों और शोध के आधार पर यह कहानी बनी है, उन्हें एक फिल्म के माध्यम से जनता तक पहुंचाया जाए।


यतिन कार्येकर
प्रश्न: किसी भी किरदार को चुनते समय आप सबसे पहले क्या देखते हैं? और जब आपको 'द बोस फाइल्स' का प्रस्ताव मिला, तो इस कहानी की कौन-सी बात ने आपको सबसे ज्यादा आकर्षित किया?

उत्तर : मैं हमेशा ऐसे किरदार चुनता हूं जो मुझे एक कलाकार के तौर पर चुनौती दें और कुछ नया सीखने का मौका दें। जब राजेश जी ने मुझे 'द बोस फाइल्स' की कहानी सुनाई तो शुरुआत में मुझे उस पर विश्वास करना मुश्किल लगा। एक अभिनेता के लिए सबसे जरूरी होता है कि वह पहले खुद कहानी और अपने किरदार पर भरोसा करे, इसलिए मैंने इस विषय पर गहराई से रिसर्च की, दस्तावेज पढ़े और लेखकों से लंबी चर्चा की।

सबसे ज्यादा हैरानी मुझे इस बात ने दी कि बचपन से जो इतिहास हमने पढ़ा, उससे जुड़े कई सवाल आज भी अनुत्तरित हैं। अगर महत्वपूर्ण तथ्य मौजूद हैं, तो उन्हें लोगों और खासकर युवा पीढ़ी के सामने आना चाहिए। यही जिज्ञासा और इस विषय की गंभीरता मुझे इस फिल्म का हिस्सा बनने के लिए सबसे ज्यादा प्रेरित करने वाली वजह बनी।

अनुज धर
प्रश्न : आपकी वर्षों की रिसर्च के जरिए ही यह दावा सामने आता है कि नेताजी की मृत्यु विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी। आखिर वह कौन-सी बात थी जिसने आपको इस विषय पर शोध करने के लिए प्रेरित किया?

उत्तर : मैं मजाक में कहता हूं कि हमारे देश में कुछ लोग आकस्मिक प्रधानमंत्री बने और मैं अचानक शोधकर्ता बन गया। मैं उस समय हिंदुस्तान टाइम्स में काम करता था। बचपन से नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु को लेकर विवाद के बारे में सुना था, लेकिन ज्यादा जानकारी नहीं थी। 2001 में जब मुझे नेताजी की मृत्यु की जांच कर रहे आयोग की कार्यवाही को कवर करने का मौका मिला तभी मेरी रिसर्च की शुरुआत हुई।

शुरुआत में मैं भी विमान दुर्घटना वाली कहानी को ही सच मानता था लेकिन धीरे-धीरे दस्तावेजों, सरकारी रिकॉर्ड और कई लोगों से बातचीत के जरिए ऐसे तथ्य सामने आए, जिन्होंने मेरी सोच बदल दी। पिछले करीब 25 वर्षों में मैंने हजारों दस्तावेजों का अध्ययन किया कई जगहों पर जाकर जांच की और उपलब्ध सबूतों के आधार पर निष्कर्ष तक पहुंचा। मेरा मानना है कि इतिहास से जुड़े ऐसे महत्वपूर्ण सवालों पर खुली चर्चा होनी चाहिए और फिल्म एक प्रभावी माध्यम है, जिससे यह विषय ज्यादा लोगों तक पहुंच सकता है। लोग सवाल पूछेंगे और चर्चा करेंगे। 

चंद्रचूड़ घोष
प्रश्न : आपने कैसे तय किया कि फिल्म के लिए कौन-सी बातें सबसे ज़रूरी हैं? और आपको क्या लगता है कि यह कहानी जानने के बाद लोगों की सोच में क्या बदलाव आएगा?

उत्तर:  मेरा पारिवारिक जुड़ाव नेताजी सुभाष चंद्र बोस और स्वतंत्रता आंदोलन से बचपन से रहा है। मेरे दादाजी फॉरवर्ड ब्लॉक से जुड़े थे और स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा रहे थे, इसलिए घर में हमेशा नेताजी और उनके संघर्षों की चर्चा होती रहती थी। हालांकि करियर की वजह से मैं कुछ समय के लिए इस विषय से दूर हो गया था। बाद में अनुज की रिपोर्ट पढ़ी तो शुरुआत में मुझे भी यह कहानी अविश्वसनीय लगी, लेकिन धीरे-धीरे शोध और बातचीत के बाद मेरी सोच बदली।

2005 में आरटीआई कानून आने के बाद हमने नेताजी से जुड़े दस्तावेजों को सामने लाने की कोशिश शुरू की। वर्षों तक आरटीआई, दस्तावेजों, गवाहों और शोध के आधार पर हमने हजारों रिकॉर्ड खंगाले और कई जगहों पर जाकर जानकारी जुटाई। करीब दो दशकों की मेहनत के बाद हमें लगा कि 1945 की आधिकारिक कहानी से जुड़े कई सवालों के जवाब अब भी बाकी हैं। इसी शोध के आधार पर हमने अपने दस्तावेज फिल्म के लिए उपलब्ध कराए, जबकि इसकी स्क्रिप्ट राजेश गुप्ता जी ने तैयार की है। हमारा उद्देश्य केवल इतना है कि ऐतिहासिक विषयों पर प्रमाणों के साथ खुलकर चर्चा हो और लोग तथ्यों के आधार पर अपनी राय बना सकें।

यतिन कार्येकर
प्रश्न: पहले के मुकाबले आज काफी बदलाव आ चुका है आपको क्या लगता है कि आज का युवा भारत और सिनेमा से क्या उम्मीद करता है? क्या आपको लगता है कि सिनेमा समाज में बदलाव ला सकता है?

उत्तर: मेरे लिए अभिनय हमेशा खुद को सीखने, बदलने और नई चुनौतियों को स्वीकार करने का माध्यम रहा है। मैंने टेलीविजन के शुरुआती दौर से लेकर फिल्मों के बदलाव और अब ओटीटी के नए दौर तक का सफर देखा है। इन सभी माध्यमों में एक चीज हमेशा सबसे महत्वपूर्ण रही है और वह है कंटेंट। मेरे लिए यह मायने रखता है कि हम दर्शकों को क्या दे रहे हैं, उसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ रहा है और क्या वह लोगों की सोच में कोई सकारात्मक बदलाव ला रहा है।

अगर मेरे पूरे करियर को देखा जाए तो मैंने हमेशा ऐसे किरदार और प्रोजेक्ट चुनने की कोशिश की है जिनके पीछे कोई उद्देश्य या सामाजिक संदेश हो। 'द बोस फाइल्स' का हिस्सा बनना मेरे लिए बेहद गर्व की बात है, क्योंकि इस फिल्म के पीछे 20-24 वर्षों का गहन शोध और मेहनत जुड़ी हुई है। इतने लंबे समय तक किसी ऐतिहासिक विषय पर काम करना आसान नहीं होता।

इस फिल्म के जरिए हमारी कोशिश सिर्फ एक कहानी बताना नहीं, बल्कि आज की युवा पीढ़ी को यह समझाना भी है कि देश की आजादी केवल एक तारीख नहीं बल्कि लाखों लोगों के संघर्ष, त्याग और बलिदान का परिणाम है। जब युवा अपने इतिहास और स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को सही मायने में समझेंगे, तभी वे अपने देश, अपने अधिकारों और अपनी जिम्मेदारियों के प्रति ज्यादा जागरूक हो पाएंगे।

राजेश गु्प्ता
प्रश्न: आखिर दर्शक ‘द बोस फाइल्स’ कब, कहां और क्यों देखें? इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत क्या है?

उत्तर: यह फिल्म 31 जुलाई 2026 को देश के 42 शहरों में करीब 200 स्क्रीन पर रिलीज हो रही है। इस फिल्म को बनाने की सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि अनुज धर और चंद्रचूड़ घोष जी के करीब 26 हजार घंटे के शोध को दो घंटे की फिल्म में किस तरह प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया जाए। हमारे पास इतना ज्यादा रिसर्च मटेरियल था कि सबसे मुश्किल काम यह तय करना था कि क्या शामिल किया जाए और क्या छोड़ा जाए।

पिछले आठ महीनों से हम लगातार एडिटिंग पर काम कर रहे थे। कई बार लगा कि फिल्म बनाने से ज्यादा कठिन उसे सही आकार देना है। चंद्रचूड़ जी की करीब 800 पन्नों की किताब 'Conundrum' पढ़ने के बाद मुझे भी कई ऐसी जानकारियां मिलीं, जिनसे मैं पहले अनजान था। इस विषय में गहराई से जाने के बाद समझ आया कि इतिहास के कई पहलू अब भी लोगों के सामने पूरी तरह नहीं आ पाए हैं।

फिल्म में दर्शकों को ऐसे कई तथ्य और घटनाएं देखने को मिलेंगी, जिनका जिक्र आम इतिहास की किताबों में नहीं मिलता। फिल्म के कई संवाद वास्तविक घटनाओं और उन लोगों के बयानों पर आधारित हैं, जिन्होंने नेताजी से जुड़े अपने अनुभव साझा किए थे। हमने कोशिश की है कि उन बातों को उनकी मूल भावना के साथ पेश किया जाए, ताकि कहानी की विश्वसनीयता बनी रहे और दर्शक उस दौर को बेहतर तरीके से महसूस कर सकें।

 

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