Exclusive Interview: 'दायरा' भारत की कहानी , इसलिए कास्टिंग में दिखी देश की विविधता: मेघना गुलजार

Edited By Updated: 17 Sep, 2026 02:04 PM

meghna gulzar and prithviraj sukumaran exclusive interview with punjab kesari

दायरा फिल्म को लेकर डायरेक्टर मेघना गुलजार और एक्टर पृथ्वीराज सुकुमारन ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। अपनी फिल्मों में संवेदनशील विषयों, बारीकियों और मजबूत किरदारों के लिए पहचानी जाने वाली निर्देशक मेघना गुलजार अब फिल्म ‘दायरा’ लेकर दर्शकों के बीच आ रही हैं। फिल्म में पृथ्वीराज सुकुमारन एक पुलिस अधिकारी के किरदार में नजर आएंगे। फिल्म के ट्रेलर ने कहानी को लेकर दर्शकों के बीच उत्सुकता बढ़ा दी है। ‘दायरा’ 18 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है। इस फिल्म को लेकर डायरेक्टर मेघना गुलजार और एक्टर पृथ्वीराज सुकुमारन ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...   

मेघना गुलजार
सवाल: आपकी फिल्मों में कहानी के साथ फ्रेम, म्यूजिक और डिटेलिंग पर भी काफी ध्यान दिया जाता है। आप अपनी फिल्मों के विषय किस तरह चुनती हैं?

मेघना गुलजार: मेरे टॉपिक्स मुझे चुनते हैं। यह कोई बहुत कॉन्शियस प्रोसेस नहीं है। किसी तरह ये कहानियां खुद मेरे पास आती हैं। मैं उन्हें ढूंढने नहीं जाती। जब कोई कहानी या विषय मेरे पास आता है और मुझे उस पर सोचने की जरूरत पड़ती है तो मुझे पता होता है कि मैं वह फिल्म नहीं बनाऊंगी। लेकिन अगर पहली बार में ही मेरे अंदर से आता है कि हां, मुझे यह कहानी कहनी है, तो फिर मैं उसे बनाती हूं।

सवाल: आपकी फिल्में अक्सर गंभीर और डार्क विषयों पर होती हैं। क्या भविष्य में आप कोई हल्की-फुल्की या एस्केपिस्ट फिल्म करना चाहेंगी?

मेघना गुलजार: मैं कभी ‘नेवर’ नहीं कहती। पिछले 12 साल से मैं मुश्किल, डार्क और रियल विषयों पर काम कर रही हूं। मैं बहुत समय से कहती आ रही हूं कि अब कुछ आसान करना चाहती हूं। ‘राजी’ के बाद भी मैंने यही कहा था, लेकिन फिर ‘छपाक’ बना दी। ‘छपाक’ के बाद भी यही कहा और उसके बाद ‘सैम बहादुर’ कर लिया। इसलिए मेरी टीम भी अब मेरी इस बात पर हंसती है। लेकिन सच में, मैं कुछ आसान करना चाहती हूं। खासकर एक मैच्योर लव स्टोरी करना मुझे बहुत पसंद आएगा।


सवाल: ‘दायरा’ में कास्टिंग काफी अलग और विविध नजर आ रही है। आपने कलाकारों का चुनाव किस तरह किया?

मेघना गुलजार: ‘दायरा’ कई मुद्दों और घटनाओं को जोड़कर बनाई गई कहानी है। मैं इसे किसी एक राज्य या क्षेत्र तक सीमित नहीं करना चाहती थी। यह कहानी भारत की है और दुनिया में कहीं भी घट सकती है। इसलिए फिल्म की कास्टिंग में भी भारत के अलग-अलग हिस्सों की झलक दिखाना जरूरी था। हमारे पास उत्तर, दक्षिण, पूर्व, बंगाल, असम और गुजरात समेत अलग-अलग क्षेत्रों के कलाकार हैं। इन सभी कलाकारों ने मिलकर फिल्म की काल्पनिक दुनिया और उसके माहौल को बहुत वास्तविक बनाया है।

सवाल: पृथ्वीराज के किरदार ‘रमन’ में उन्होंने ऐसा क्या जोड़ा, जो आपको खास लगा?

मेघना गुलजार: उन्होंने रमन के किरदार में बहुत ज्यादा ‘इंसिन्युएशन’ यानी इशारों में बात कहने वाली परत जोड़ी है। रमन काफी ग्रे स्पेस में काम करता है। ऐसे किरदार में आप हमेशा वही नहीं कह सकते जो आपके मन में है और न ही हमेशा वही मतलब होता है जो आप कहते हैं। पृथ्वीराज ने इसी बात को अपने किरदार में बहुत खूबसूरती से उतारा है।

सवाल: आपने कई बार देखा है कि लोकप्रिय और कमर्शियल फिल्मों की बड़ी अभिनेत्रियां आपकी फिल्मों में बिल्कुल अलग अंदाज में नजर आती हैं। क्या आप उन्हें किसी खास सोच के तहत कास्ट करती हैं?

मेघना गुलजार: मैं किसी कलाकार को उसकी लोकप्रियता या स्टारडम के आधार पर कास्ट नहीं करती। मेरे लिए सबसे जरूरी यह है कि वह कलाकार उस किरदार के लिए कितना सही है। अगर कोई कलाकार लोकप्रिय नहीं है, लेकिन किरदार के लिए सही है, तो मैं उसे जरूर कास्ट करूंगी। उदाहरण के लिए ‘राजी’ में मुझे शुरू से पता था कि आलिया भट्ट ही इस किरदार के लिए सही हैं, क्योंकि उसमें वल्नरेबिलिटी और फ्रैजिलिटी के साथ यह भरोसा भी होना था कि वह जरूरत पड़ने पर किसी की जान ले सकती है।

दीपिका के मामले में उनकी लक्ष्मी अग्रवाल से शारीरिक समानता मुझे काफी महत्वपूर्ण लगी। इसलिए वह कितनी बड़ी स्टार हैं या उन्होंने पहले किस तरह के रोल किए हैं, इससे मेरे लिए कोई फर्क नहीं पड़ा। इसी तरह ‘अजूनी’ के लिए मुझे एक ऐसी महिला पुलिस अधिकारी चाहिए थी, जो इस किरदार को एक अलग तरीके से देख सके। मुझे लगा कि करीना इस किरदार को अलग तरह से इंटरप्रेट करेंगी और उन्होंने ऐसा ही किया।


पृथ्वीराज सुकुमारन
सवाल: ‘दायरा’ में आपका किरदार काफी ग्रे नजर आ रहा है। जब आपको पहली बार फिल्म की स्क्रिप्ट ऑफर हुई तो आपके मन में क्या सवाल थे?

पृथ्वीराज सुकुमारन: मैं और मेघना पहली बार इसी होटल में मिले थे। उन्होंने मुझे करीब 45 मिनट से एक घंटे तक फिल्म की नैरेशन दी। इसके बाद उन्होंने मुझे स्क्रिप्ट दी। मैंने कहा कि मैं इसे पढ़कर जल्द वापस आता हूं। उस समय मेरी पत्नी सुप्रिया का जन्मदिन था और मेघना ने मुझसे कहा कि जन्मदिन खराब मत करो, स्क्रिप्ट कल पढ़ लेना। लेकिन फिल्म का विषय मेरे दिमाग में रह गया था, इसलिए मैं उसी समय इसे पढ़ना चाहता था।

सवाल: स्क्रिप्ट पढ़ते समय आपको सबसे ज्यादा क्या चीज प्रभावित कर रही थी?

पृथ्वीराज सुकुमारन: मैं यह देखना चाहता था कि नैरेशन में जो बात मेघना ने कही है, वह स्क्रिप्ट में भी उसी तरह मौजूद है या नहीं। मुझे लगा कि फिल्म में दो अलग-अलग नजरिए हैं और एक फिल्ममेकर के तौर पर मेघना किसी एक पक्ष को थोपती नहीं हैं। दोनों पक्षों को बहुत मजबूती और संवेदनशीलता के साथ रखा गया है। यही बात मुझे स्क्रिप्ट में बहुत अच्छी लगी। फिल्म देखने के बाद दर्शक भी खुद से सवाल करेंगे कि आखिर सही कौन है और गलत कौन।

सवाल: आज सोशल मीडिया पर फिल्म रिलीज होते ही लोग तुरंत रिव्यू देना शुरू कर देते हैं। एक कलाकार के तौर पर क्या यह आपको प्रभावित करता है?

पृथ्वीराज सुकुमारन: एक कलाकार के तौर पर मुझे इस बात से परेशानी नहीं है कि किसी को फिल्म पसंद आई या नहीं। हर व्यक्ति को अपनी राय रखने का पूरा अधिकार है। मुझे सिर्फ उस जल्दबाजी से समस्या है, जिसमें लोग फिल्म खत्म होते ही सबसे पहले रिव्यू देने की कोशिश करते हैं। कई बार फिल्म खत्म होने के कुछ सेकंड बाद ही रिव्यू सामने आ जाता है। मेरी सिर्फ इतनी गुजारिश है कि फिल्म देखने के बाद थोड़ा समय दीजिए और सोचिए कि आपने क्या देखा है।

सवाल: क्या आपको लगता है कि फिल्म को समझने के लिए दर्शकों और समीक्षकों को थोड़ा समय देना चाहिए?

पृथ्वीराज सुकुमारन: बिल्कुल। खासकर ‘दायरा’ जैसी फिल्म के लिए यह और जरूरी है, क्योंकि यह फिल्म खत्म होने के बाद आपके मन में कई सवाल छोड़ती है। इसलिए जरूरी नहीं कि फिल्म देखते ही आप अपना रिव्यू बनाना शुरू कर दें। पहले फिल्म को महसूस कीजिए, उसे समझिए और फिर अपनी राय व्यक्त कीजिए। आपको फिल्म पसंद नहीं आई तो आप खुलकर कहिए, लेकिन थोड़ा सोचने के बाद।


सवाल: आज दर्शक भी कई बार किसी दूसरे व्यक्ति के रिव्यू के आधार पर फिल्म देखने या न देखने का फैसला कर लेते हैं। आप इस पर क्या कहना चाहेंगे?

पृथ्वीराज सुकुमारन: किसी दूसरे व्यक्ति को अपनी सोच तय करने मत दीजिए। हर रिव्यू सिर्फ उस व्यक्ति की राय है। अगर किसी समीक्षक को फिल्म अच्छी लगी, तो इसका मतलब यह नहीं कि आपको भी अच्छी लगेगी। इसी तरह किसी को फिल्म खराब लगी, तो जरूरी नहीं कि आपको भी वैसा ही महसूस हो। फिल्म देखिए, खुद महसूस कीजिए और फिर अपनी राय बनाइए।

 

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