इस सीरीज के बारे में स्टारकास्ट सोनाली बेंद्रे, अली फजल, आमिर बशीर,रमणदीप यादव, आकाश मखीजा, डायरेक्टर प्रसीद रॉय, अनुषा नंदकुमार और संदीप साकेत ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश..
नई दिल्ली/टीम डिजिटल। अमेजन प्राइम वीडियो की हाल ही में रिलीज हुई सीरीज राख ने ऑडियंस का दिल जीत लिया है। सीरीज की कहानी उन पेरेंट्स पर आधारित है जिनके दोनों बच्चों की हत्या हो जाती है। इस सीरीज में सोनाली बेंद्रे ने मां का रोल अदा किया है और इस पूरे मामले की जांच कर रहे हैं पुलिस अफसर जय प्रकाश यानी अली फजल हैं। इस सीरीज में सोनाली बेंद्रे और अली फजल के अलावा आमिर बशीर, आकाश मखीजा और राकेश बेदी मुख्य भूमिका में नजर आएंगे। इस सीरीज को प्रसीद रॉय द्वारा डायरेक्ट किया गया है। इस सीरीज के बारे में स्टारकास्ट सोनाली बेंद्रे, अली फजल, आमिर बशीर,रमणदीप यादव, आकाश मखीजा, डायरेक्टर प्रसीद रॉय, अनुषा नंदकुमार और संदीप साकेत ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश..
सवाल: राकेश सर की कास्टिंग का आइडिया किसका था? क्या उन्हें शुरू से ही इस किरदार के लिए चुना गया था?
प्रसीद रॉय: बिल्कुल, यह फैसला पहले ही हो चुका था। दरअसल यह विचार हमारे कास्टिंग डायरेक्टर वैभव का था। उनकी कंपनी का नाम ही ‘एंटी कास्टिंग’ है और वे हमेशा कुछ अलग और दिलचस्प कास्टिंग करने की कोशिश करते हैं।जब हमने इस शो पर काम शुरू किया तो हम कई तरह की कास्टिंग संभावनाओं पर चर्चा कर रहे थे। तभी वैभव ने उनका नाम सुझाया। जाहिर है, हम उनसे ऑडिशन नहीं करवा सकते थे, इसलिए उन्होंने कहा कि पहले उनसे मिलिए।मैं, अनुषा और संदीप उनसे मिले और बातचीत के दौरान हमें महसूस हुआ कि जिस दौर और दुनिया को हम इस शो में रचने की कोशिश कर रहे थे, उसके बारे में उनकी समझ बेहद गहरी थी।
सवाल: क्या भविष्य में आपको रोमांटिक कॉमेडी बनाते हुए भी देखा जा सकता है?
प्रसीद रॉय: हंसते हुए बोले कि बिल्कुल है। सच तो यह है कि मैं रोमांटिक कॉमेडी ही बनाना चाहता था। लेकिन इन्होंने मेरे लिए रोम-कॉम लिखी ही नहीं, इसलिए मुझे ‘राख’ बनानी पड़ी। लेकिन गंभीरता से कहूं तो इतने बड़े निर्देशकों के साथ काम करके मैंने शिल्प सीखा है। मुझे जमीन से जुड़ी कहानियां समझ में आती हैं। ऐसे किरदार और ऐसी दुनिया मुझे आकर्षित करती है। इसलिए मैं बार-बार इसी तरह की कहानियों की ओर लौट आता हूं। ये कहानियां हमारे समाज, हमारी मिट्टी और हमारी वास्तविकताओं से निकलती हैं और शायद इसी वजह से मैं उनसे जुड़ पाता हूं।
अली फजल
सवाल: जयप्रकाश का किरदार निभाने के बाद पुलिस और उसके मानवीय पक्ष को लेकर आपकी सोच में क्या बदलाव आया?
अली फज़ल: मेरी सोच में भ्रष्टाचार को लेकर कोई खास बदलाव नहीं आया क्योंकि जयप्रकाश का किरदार भ्रष्ट नहीं है। हालांकि वह गलतियां करता है। मुझे लगता है कि इस किरदार की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें वर्दी के पीछे छिपे इंसान को दिखाया गया है। लेखकों और निर्माताओं ने इस पहलू पर काफी ध्यान दिया। मुझे यह बात बहुत पसंद आई क्योंकि हमने स्क्रीन पर इस तरह का पुलिस अधिकारी बहुत कम देखा है।
वह मजबूत है, जिम्मेदार है, लेकिन उसके अपने संघर्ष भी हैं। हमारे समाज में पहचान, वर्ग और सामाजिक स्थिति जैसी चीजें इंसान को लगातार प्रभावित करती हैं। वर्दी पहन लेने से वे समस्याएं खत्म नहीं हो जातीं। यही इस किरदार की विडंबना भी है। आपके पास अधिकार हैं, शक्ति है, लेकिन फिर भी आप उन सामाजिक परिस्थितियों में फंसे रहते हैं जो कई बार वर्दी से भी बड़ी साबित होती हैं।
आमिर बशीर
सवाल: जंगल वाले भावनात्मक दृश्य को आपने कैसे तैयार किया?
आमिर बशीर: सच कहूं तो इसमें किसी तरह की ‘मास्टरी’ जैसा कुछ नहीं होता। जहां तक मुझे याद है, हमने उस दृश्य को लेकर बहुत ज्यादा चर्चा भी नहीं की थी। बस यह तय हुआ था कि यह वह क्षण है जहां यह आदमी पूरी तरह टूट जाता है। जो कुछ वह देखता है, उसके बाद उसकी दुनिया बिखर जाती है। मेरे लिए उस दृश्य का मूल भाव यही था बिखर जाना। बाकी जो भी भावनाएं सामने आती हैं, वे उसी टूटन का परिणाम हैं।
मैं यह सोचकर नहीं गया था कि आगे मुझे क्या करना है या कौन-सा भाव कैसे दिखाना है। वह स्थिति ही इतनी शक्तिशाली है कि आप बहुत ज्यादा तैयारी करके नहीं जा सकते। अगर आप पहले से सब तय कर लें तो अभिनय यांत्रिक लगने लगता है। इसलिए मैंने उस दृश्य को महसूस किया और उसी के साथ बह गया।
सोनाली बेंद्रे
सवाल: ‘राख’ में ऐसा क्या था जिसने आपको तुरंत हां कहने पर मजबूर कर दिया?
सोनाली: सबसे पहले तो मैं यह कहना चाहूंगी कि लीगेसी शब्द मेरे लिए थोड़ा बड़ा है। मैं यहां काफी समय से हूं, अपनी उम्र के अनुसार काम कर रही हूं लेकिन अभी मैं खुद को उस स्तर पर नहीं मानती। और सच कहूं तो मैं किसी विरासत के बारे में सोचकर काम भी नहीं करती। जहां तक राख की बात है तो यह किसी भी अभिनेता के लिए शानदार सामग्री थी। यह ऐसा किरदार था जिसे मना करने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी।
सिर्फ एक बात थी कि यह पूरी तरह मेरा शो नहीं था। स्क्रीन टाइम सीमित था। यही एक मानसिक बाधा थी जिसे मुझे पार करना था। लेकिन जैसे ही मैंने उस बात को दिमाग से निकाला, मुझे महसूस हुआ कि यह किरदार इतना शानदार है कि मैं किसी और को इसे निभाते हुए देखना ही नहीं चाहती थी। मुझे लगा कि यह भूमिका मेरी है और मुझे ही करनी चाहिए।
उसके बाद इसे करने का फैसला बिल्कुल आसान हो गया।
सवाल: क्या कोई ऐसा दृश्य था जिसे लेकर आप शुरुआत में घबराई हुई थीं, लेकिन शूटिंग के बाद आपको लगा कि यह उम्मीद से कहीं बेहतर हुआ?
सोनाली: मेरे लिए शो का शुरुआती दृश्य सबसे चुनौतीपूर्ण था, जिसमें मां और बच्चों का रिश्ता दिखाया गया है। वह बहुत साधारण दृश्य है, लेकिन उसी एक दृश्य में हमें यह स्थापित करना था कि यह दुनिया इस महिला के लिए क्या मायने रखती है। हमने उस दृश्य पर बहुत बातचीत की और काफी मेहनत की। मेरे लिए वही दृश्य सबसे कठिन था, लेकिन अंत में जब वह बनकर सामने आया तो मुझे बहुत संतोष मिला।
आकाश मखीजा
सवाल: अभिनय की दुनिया में कदम रखते समय सबसे बड़ा डर क्या था?
आकाश: सबसे बड़ा डर यही था कि काम मिलेगा कैसे? मेरा इस इंडस्ट्री से कोई संबंध नहीं था। अभिनय करने का सपना था, लेकिन रास्ता बिल्कुल साफ नहीं था। बाकी नौकरियों में एक तय ग्राफ होता है तनख्वाह, प्रमोशन और स्थिरता। लेकिन अभिनय पूरी तरह अनिश्चित है।
जब मैं लोकल ट्रेन में सफर करता था तो मेरे दोस्त नौकरी कर रहे होते थे। वे अपने करियर में आगे बढ़ रहे थे और मैं उन्हें बताता था कि आज एक और ऑडिशन देने जा रहा हूं। डर यही था कि कहीं ऐसा न हो कि जिंदगी भर सिर्फ ऑडिशन ही देते रह जाएं और काम कभी न मिले। सौभाग्य से समय लगा, लेकिन काम आता गया और चीजें बेहतर होती गईं।
रमणदीप यादव
सवाल: आपके लिए सबसे बड़ा डर क्या था? आपका अनुभव कैसा रहा?
रमणदीप: मुझे लोगों के सामने प्रदर्शन करने का डर कभी नहीं लगा क्योंकि मैं पहले खेलों से जुड़ा हुआ था। वहां भी लगातार प्रदर्शन करना पड़ता है। लेकिन मुझे अपने परिवार की उम्मीदों से डर लगता था। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने मुझे कभी रोका नहीं। जब मैं खेलों में था तब भी उनका पूरा समर्थन था और जब अभिनय में आया तब भी उन्होंने कहा कि जो करना है करो। कई बार मुझे लगता था कि कोई तो रोके, कोई तो कहे कि सोच-समझकर फैसला लो। लेकिन उनका समर्थन इतना ज्यादा था कि डर यही था कि अगर मैं सफल नहीं हुआ तो उनकी उम्मीदों का क्या होगा। आखिरकार दुनिया चाहे जितना प्यार दे, सबसे ज्यादा मायने परिवार ही रखता है।
सवाल: तीन साल तक इस शो पर काम हुआ। लिखते समय सबसे बड़ी चुनौती क्या थी? और नए लेखकों के लिए आपकी क्या सलाह है?
अनुषा: हमने इस दौरान बहुत सारा लिखा और उतना ही फेंका भी। तीन साल की प्रक्रिया में केवल एक चीज नहीं बदली शो का मूल ढांचा। हमें पता था कि कहानी किस दिशा में जाएगी। लेकिन कई किरदारों की कहानियां बदलती रहीं। कोई मर गया, फिर जिंदा हो गया। किसी की शादी हो गई, फिर पत्नी हट गई, फिर प्रेमिका आ गई। हम लगातार उस दुनिया को तलाशते रहे। यही लेखन की खूबसूरती है। आप प्रयोग करते हैं, सवाल पूछते हैं और अंत में वहां पहुंचते हैं जो आपको सही लगता है।
मैं इसे थोड़ा सकारात्मक तरीके से खत्म करना चाहूंगी। बहुत से लोग कहते हैं कि उन्हें मौका नहीं मिल रहा, लेकिन सच यह भी है कि कई लोग पर्याप्त मेहनत नहीं कर रहे होते। सिर्फ आइडिया लेकर मत जाइए। पूरी स्क्रिप्ट लिखिए। अच्छी स्क्रिप्ट की इंडस्ट्री में हमेशा जरूरत रहती है। अगर आपका लेखन अच्छा है तो आपको जरूर अवसर मिलेगा।
संदीप: मैं नए लेखकों को यही सलाह दूंगा कि अपने विचारों और अपनी दृष्टि पर भरोसा रखें। स्क्रिप्ट को हमेशा रजिस्टर करवाएं। अधूरी कहानियां लेकर मत घूमिए। पूरा लिखिए। किसी को बिना सोचे-समझे स्क्रिप्ट मत भेजिए। अपने काम की सुरक्षा कीजिए। मुंबई में हर कोई कहानी लिख रहा है इसलिए अपने काम को गंभीरता से लेना बहुत जरूरी है।