Edited By Tanuja,Updated: 20 Jan, 2026 06:15 PM

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) भारत से ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल खरीदने की दिशा में गंभीरता से आगे बढ़ रहा है। पाकिस्तान के JF-17 लड़ाकू विमान को यूएई ने नकार दिया है। ब्रह्मोस सौदे में MTCR नियम और रूस की मंजूरी बड़ी अड़चन बने हुए हैं।
International Desk: भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच रक्षा सहयोग तेजी से नए स्तर पर पहुंच रहा है। दोनों देशों के बीच करोड़ों डॉलर की डिफेंस डील की संभावना है, जिसमें भारत की घातक ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल अहम भूमिका निभा सकती है। वहीं पाकिस्तान को इस मोर्चे पर करारा झटका लगा है, क्योंकि यूएई ने उसके JF-17 लड़ाकू विमान को खरीदने से साफ इनकार कर दिया है। ब्रह्मोस मिसाइल ने पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपनी ताकत पूरी दुनिया को दिखाई थी। पाकिस्तान के 11 एयरबेस पर सटीक हमलों के बाद ब्रह्मोस की अंतरराष्ट्रीय मांग में जबरदस्त उछाल आया। फिलीपींस पहले ही ब्रह्मोस मिसाइल खरीद चुका है और अतिरिक्त ऑर्डर भी दे चुका है।
इसी बीच यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान (MBZ) के हालिया भारत दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच एक अहम रक्षा समझौता हुआ। इस समझौते के तहत भारत और यूएई संयुक्त रूप से हथियारों के निर्माण पर काम करेंगे। रक्षा सूत्रों के मुताबिक ब्रह्मोस मिसाइल सौदा भी अंतिम चरण में है, हालांकि कुछ तकनीकी और कूटनीतिक अड़चनें अभी बनी हुई हैं। सूत्रों के अनुसार, सबसे बड़ी रुकावट MTCR (मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रेजीम) है, जिसके तहत 290 किलोमीटर की रेंज सीमा लागू होती है। भारत MTCR का सदस्य है और उसने ब्रह्मोस की रेंज को 450 किलोमीटर से अधिक बढ़ा दिया है, लेकिन यूएई इस व्यवस्था का सदस्य नहीं है। इसके अलावा, ब्रह्मोस परियोजना में साझेदार होने के कारण रूस की मंजूरी भी जरूरी है।
वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान लगातार JF-17 लड़ाकू विमान की बिक्री को लेकर झूठे दावे कर रहा है। उसने इंडोनेशिया, सऊदी अरब और अन्य देशों को JF-17 बेचने का दावा किया था, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ये दावे हकीकत से कोसों दूर हैं। यूएई द्वारा JF-17 को नकारा जाना पाकिस्तान के लिए बड़ा कूटनीतिक झटका माना जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि हाल ही में यूएई के राष्ट्रपति पाकिस्तान भी गए थे, लेकिन वहां किसी बड़े रक्षा या रणनीतिक समझौते की जगह उनका दौरा बेहद सीमित रहा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनका ज्यादातर समय दुर्लभ पक्षियों के शिकार और पाकिस्तानी सेना से जुड़ी संस्थाओं को एक अरब डॉलर के दान में ही बीत गया। कुल मिलाकर, जहां पाकिस्तान की हथियार बिक्री की कोशिशें दम तोड़ती दिख रही हैं, वहीं भारत की ब्रह्मोस मिसाइल वैश्विक रक्षा बाजार में नई पहचान बना रही है।