Edited By Tanuja,Updated: 12 Feb, 2026 12:16 PM

अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कनाडा पर लगाए गए शुल्कों को पलटने के पक्ष में मतदान किया। यह कदम ट्रंप की व्यापार नीति के खिलाफ एक प्रतीकात्मक असहमति है। हालांकि, अंतिम फैसला राष्ट्रपति की मंजूरी पर निर्भर करेगा।
Washington: अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने देश के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कनाडा पर लगाए गए शुल्क को पलटने के लिए मतदान किया जो 'व्हाइट हाउस' (अमेरिका के राष्ट्रपति का आधिकारिक आवास एवं कार्यालय) के एजेंडे की एक दुर्लभ लेकिन काफी हद तक प्रतीकात्मक आलोचना है। बुधवार को इस प्रस्ताव के पक्ष में 219 और इसके खिलाफ 211 मत पड़े। ऐसा संभवत: पहली बार है जब रिपब्लिकन पार्टी के नियंत्रण वाली प्रतिनिधि सभा ने किसी महत्वपूर्ण नीति को लेकर राष्ट्रपति का विरोध किया है। प्रस्ताव का उद्देश्य उस राष्ट्रीय आपात स्थिति को समाप्त करना है, जिसे ट्रंप ने शुल्क लगाने के लिए घोषित किया है लेकिन इस नीति को पलटने के लिए वास्तव में ट्रंप के भी समर्थन की आवश्यकता होगी जो असंभव प्रतीत होता है।
यह प्रस्ताव अब सीनेट के पास जाएगा। ट्रंप का मानना है कि शुल्क अमेरिकी व्यापार साझेदारों को बातचीत की मेज पर लाने के लिए असरदार हैं लेकिन सांसदों को अपने-अपने क्षेत्रों में व्यापार युद्धों के कारण जूझ रहे कारोबारियों एवं इनके जेब पर पड़ने वाले असर एवं ऊंची कीमतों से परेशान मतदाताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है। प्रतिनिधि सभा की विदेश मामलों की समिति में डेमोक्रेटिक पार्टी के शीर्ष नेता एवं न्यूयॉर्क से सांसद ग्रेगरी मीक्स ने यह प्रस्ताव पेश किया। उन्होंने कहा, ''आज का मतदान सरल है, बहुत सरल- क्या आप अमेरिकी परिवारों के लिए जीवनयापन की लागत घटाने के पक्ष में वोट देंगे या एक व्यक्ति-डोनाल्ड जे. ट्रंप-के प्रति वफादारी के कारण कीमतें ऊंची बनाए रखेंगे?''
यह मतदान राष्ट्रपति के कदमों को लेकर प्रतिनिधि सभा की बेचैनी की एक झलक देता है। सीनेट ने असंतोष जताते हुए पहले ही कनाडा और अन्य देशों पर ट्रंप के शुल्कों को खारिज करने के पक्ष में मतदान किया है लेकिन शुल्कों में कटौती के लिए दोनों सदनों को प्रस्ताव मंजूर कर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए ट्रंप के पास भेजना होगा। ट्रंप ने प्रस्तावित चीन व्यापार समझौते को लेकर कनाडा से आयातित वस्तुओं पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाने की हाल में धमकी दी थी जिससे कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के साथ उनकी तनातनी और बढ़ गई।