guerrilla warfare : क्या है गुरिल्ला युद्ध? जिसके दम पर पाकिस्तान को घुस-घुसकर मार रहा तालिबान

Edited By Updated: 15 Oct, 2025 03:15 PM

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अक्टूबर 2025 में अफगान-सीमा पर टीटीपी के गुरिल्ला हमलों ने पाकिस्तान की सेना को भारी नुकसान पहुँचाया। 58 पाक सैनिक मारे गए, जबकि टीटीपी ने 8,000 लड़ाकों के बावजूद चालाकी और पहाड़ी इलाकों का फायदा उठाकर लगातार हमला किया। अफगान तालिबान मदद और सीमा पार...

इंटरनैशनल डैस्क : अक्टूबर 2025 में अफगानिस्तान की सीमा से सटे इलाकों में भारी झड़पें हुईं, जिनमें पाकिस्तान के 58 सैनिक मारे गए। वहीं, पाकिस्तान ने दावा किया है कि उसने 200 से ज्यादा लड़ाकों को ढेर किया है। लेकिन यह आंकड़े कुछ भी कहें, हकीकत यह है कि सीमावर्ती पहाड़ों में गुरिल्ला जंग तेज हो गई है — और इसमें बाजी मार रहा है आतंकवादी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP)।

गुरिल्ला युद्ध क्या है?
गुरिल्ला युद्ध मतलब छोटे-छोटे हमलों का खेल। इसमें बड़ी सेना के खिलाफ छोटी टुकड़ियां लड़ती हैं। वे सीधी भिड़ंत से बचती हैं, अचानक हमला करती हैं और फिर छिप जाती हैं। यह युद्ध रणनीति पहाड़ों, जंगलों या गांवों में ज्यादा असरदार होती है। पुराने हथियार जैसे राइफल, आईईडी (सड़क पर बम) और अब ड्रोन का भी इस्तेमाल किया जाता है। इसका मकसद दुश्मन को थकाना, डराना और कमजोर करना होता है। वियतनाम या अफगानिस्तान की जंगों में यही तकनीक निर्णायक साबित हुई थी।

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टीटीपी की चालाकी और ताकत

टीटीपी के पास करीब 8,000 लड़ाके हैं, जबकि पाकिस्तानी सेना लाखों में है। फिर भी टीटीपी की चालाकी उन्हें बढ़त दे रही है। टीटीपी अक्सर सड़कों पर चल रहे पाकिस्तानी काफिलों पर अचानक हमला करती है। 8 अक्टूबर 2025 को दक्षिण वजीरिस्तान में ऐसा ही हमला हुआ, जिसमें 11 सैनिक मारे गए, जिनमें दो अफसर शामिल थे। हमला कर वे तुरंत अफगान सीमा पार कर जाते हैं।

पहाड़ों का किला बने इलाके
खैबर पख्तूनख्वा के उत्तरी और दक्षिणी वजीरिस्तान जैसे पहाड़ी इलाके टीटीपी के गढ़ हैं। यहां घने जंगल और ऊंची चोटियां पाकिस्तानी सेना की पहुंच को सीमित कर देती हैं। टैंक और हेलीकॉप्टर मुश्किल से काम आते हैं। टीटीपी छिपकर आईईडी बिछाती है और स्नाइपर राइफल से निशाना साधती है। जुलाई 2025 में पाकिस्तान ने “ऑपरेशन सरबकाफ” चलाया था, लेकिन टीटीपी ने कुछ ही हफ्तों में फिर से इलाके पर कब्जा कर लिया।

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सीमा पार से मदद

अफगान तालिबान, टीटीपी को ट्रेनिंग कैंप, पैसे और हथियार मुहैया करा रहा है। अमेरिका के अफगानिस्तान छोड़ने के बाद जो हथियार पीछे छूट गए, जैसे नाइट विजन गॉगल्स और स्नाइपर राइफल्स अब टीटीपी के पास हैं। सीमा खुली होने के कारण वे आसानी से हमला करके अफगानिस्तान भाग जाते हैं। सितंबर 2025 में एक बड़े हमले में 19 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए थे।

स्थानीय समर्थन की जड़ें
टीटीपी पश्तून समुदाय की नाराजगी का फायदा उठाता है। फाटा क्षेत्र को मुख्यधारा में शामिल किए जाने के बाद वहां के लोगों ने स्वायत्तता खो दी। सेना पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप हैं। इसी असंतोष को टीटीपी भुनाता है। वह खुद को पश्तूनों का रक्षक बताता है और सरकारी कर्मचारियों, पोलियो वैक्सीनेटरों और मजदूरों पर हमले करता है ताकि विकास रुके और लोग डरे रहें। इस डर के माहौल में उन्हें कुछ स्थानीय समर्थन भी मिल जाता है।

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पाकिस्तानी सेना क्यों पिछड़ रही है?

पाकिस्तानी सेना के पास आधुनिक हथियार हैं, लेकिन वह पारंपरिक (कन्वेंशनल) युद्ध के लिए बनी है। गुरिल्ला युद्ध में वे अक्सर उलझ जाती हैं। छोटे ऑपरेशन तो होते हैं, लेकिन सेना किसी इलाके पर लंबे समय तक नियंत्रण नहीं रख पाती। आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता भी बड़ी कार्रवाई में रुकावट बन रही है। 2025 में अब तक टीटीपी के 600 से ज्यादा हमले हो चुके हैं — जो 2024 के पूरे साल से भी ज्यादा हैं। इन हमलों ने हजारों लोगों को बेघर कर दिया है।

आगे क्या?
टीटीपी का यह उभार पाकिस्तान के लिए गंभीर खतरा है। अगर अफगान तालिबान की मदद नहीं रुकी, तो यह जंग और लंबी खिंच सकती है। पाकिस्तान को सिर्फ हथियार नहीं, बल्कि स्थानीय असंतोष का हल निकालना होगा। भारत सहित पूरी दक्षिण एशिया के लिए यह अस्थिरता चिंता का विषय है। गुरिल्ला युद्ध ने फिर साबित किया है कि सिर्फ संख्या या हथियार नहीं, बल्कि रणनीति और जमीन का ज्ञान ही असली ताकत होता है।

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