जिला अदालतों और हाईकोर्ट में जजों के रिक्त पदभरे जाएं

Edited By Updated: 21 May, 2026 06:28 PM

filling up of vacant posts of judges in district courts and high courts

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश मामले पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि 2006 में दायर पीआईएल को उसी समय खारिज करके कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए था...

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश मामले पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि 2006 में दायर पीआईएल को उसी समय खारिज करके कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए था। जस्टिस नागरत्ना जो देश की पहली महिला चीफ जस्टिस बनेंगी उनके अनुसार पीआईएल से पैसा या पब्लिसिटीहासिल करने का प्रयास न्यायिक व्यवस्था का दुरुपयोग है। अमेरिका की तर्ज पर भारत की सुप्रीम कोर्ट में 3 पेज के समरी नोट और सीमित समय में वकीलों की बहस पूरी करने के लिए सर्कुलर जारी हुआ था।

 

उसके बावजूद 20 साल पहले खारिज हो जाने वाली याचिका पर 16 दिन सुनवाई के बाद 9 जज लम्बा-चौड़ा फैसला लिखेंगे। ऐसी अकादमिक बहसों की वजह से हजारों दूसरे जरुरी मुकदमों की सुनवाई टल जाती है। 2015 से 2020 के दौरान सुप्रीम कोर्ट में औसतन 60 हजार मुकदमें लम्बित थे। उसके बाद यह संख्या बढ़कर 93 हजार हो गई है। लम्बित मामलों को निपटाने के नाम पर सुप्रीम कोर्ट में 4 जजों की संख्या बढ़ाने के लिए केन्द्र सरकार ने विशेष अध्यादेश जारी किया है। अध्यादेश को मानसून सत्र में संसद सेमंजूरी मिलेगी, लेकिनकॉलेजियम की सिफारिश के अनुसार नये जजों की नियुक्ति उसके पहले ही होसकती है।


जिला अदालतों और हाईकोर्ट में रिक्त पद- जिला अदालत, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से न्यायिक व्यवस्था का पिरामिड बनताहै। जिला अदालतों में लगभग 4.88 करोड़ और 25 हाईकोर्टों में लगभग 63.98 लाख मुकदमें लम्बित हैं। बड़े पैमाने पर बेरोजगारी केबावजूद जिला अदालतों में जजों के 4721 खाली पदों पर भर्ती नहीं हो रही। हाईकोर्ट के 325 रिक्त पदों पर भी नियुक्ति की बजाए रिटायर्ड जजों को अंशकालिक तौरपर नियुक्त करने का प्रयास हो रहा है। 99.83 फीसदी मुकदमें जिला अदालतों और हाईकोर्टों में लम्बित हैं।

 

संविधान लागू होने के बाद शुरुआत में सभी 8 जज एक साथ बैठकर सुनवाई करते थे। 2019 में 34 जजों की संख्या की गई जो अब बढ़कर 38 हो जायेगी। न्यायपालिका के शीर्ष पिरामिड में जजों की संख्या में बढोत्तरी और निचली अदालतों में पद खाली रहने की वजह से मुकदमेबाजी और ज्यादा बढ़ सकती है। लेकिन सरकार ने आनन- फानन में अध्यादेश जारी किया है उससे ऐसा लगता है कि नये जजों की नियुक्ति से अगले 1 दशक के भावी चीफ जस्टिस की नियुक्ति का रोडमैप निर्धारित किया जा रहा है।

 

इसबारे में विधि आयोग की रिपोर्टकी जा रही है, जिसके अनुसार प्रति 10 लाख की आबादी में 50 जज होने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में ज्यादा जज होने से विरोधाभासी फैसलों की बढोत्तरी औरमुकदमा संस्कृति के विस्तार से ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के सेंटीमेंट्स के साथ विकसित भारत का विजन गड़बड़ा सकता है।


रजिस्ट्रार और सिंगल जज- संविधान के अनुसार अधिकांश मुकदमोंका अंतिमनिपटारा हाईकोर्ट के स्तर पर हो जाना चाहिए। लेकिन पीआईएल और एसएलपी की बढ़ती संस्कृति की वजह से सुप्रीम कोर्ट में बेवजह के मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट के अनेक रिटायर्ड जजों के अनुसार रसूखदार लोगों को सीनियर और महंगे वकीलों के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट से जल्द न्याय मिल जाता है। दूसरी तरफ आम लोगों के लिए जिला अदालतों और हाईकोर्ट से तारीख पर तारीख का अभिशाप बदस्तूर जारी है। सीधे प्रसारण के बाद लोग अदालतों की कार्यवाही देख रहे हैं।

 

90 फीसदी से ज्यादा मामलों में सीनियर जज ही फैसला देते हैं। इससे दो जजों की बेंच के औचित्य पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या जजों ने पहले से ही निर्णय पर सहमति बना ली थी? यदि ऐसा है तो फिर वकीलों की बहस का क्या मतलब है? यदि जूनियर जज के साथ परामर्श नहीं हुआ तो दुसरे जज के साथ बैठने की क्या आवश्यकता है? अगर दो जजों की पीठ में जूनियरजज सहमत नहीं हुए तो मामले को तीन जजों की बेंच के पास भेजा जाता है। इसलिए दो की बजाए तीन जजों की बेंच के गठन से जजों की योग्यता और अनुभव के बेहतर लाभ लेने की जरुरत है।


सुप्रीम कोर्ट के नियमों में 2019-20 में बदलाव किये गये थे।उन्हें प्रभावी तरीके से लागू किया जाये तो जजों की संख्या में बढोत्तरी के बगैर ही लम्बित मुकदमों का बोझ कम हो सकता है। सामान्य तौर पर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जूनियर जज बनकर सुप्रीम कोर्ट में आते हैं, जिन्हें प्रभावी अधिकार देने की जरुरत है। नियमों के अनुसार जमानत और ट्रांसफरजैसे अधिकांश मुकदमों में सिंगल जज फैसला कर सकती है।

 

जिला जज की रैंक के लोग रजिस्ट्रार बनते हैं, जिन्हें जिला अदालत में फांसी देने तक का अधिकार होता है। सुप्रीम कोर्ट नियमों के अनुसार रजिस्ट्रार को मूल दस्तावेज, अनूदित प्रति, कोर्ट फीस मामलों में छूट की अर्जी, मुकदमोंकी लिस्टिंग और रुटीन अर्जियों के निपटारे के लिए न्यायिक आदेश पारित करने का अधिकार मिलना चाहिए। इससे जूनियर वकीलों को पैरवी का अवसर बढ़नेके साथ मुख्य मामले में संवैधानिक बिंदुओं के अनुसार न्यायदेने के लिए पंच परमेश्वर रुपी जजों को ज्यादा समय मिलेगा।

 

लेखकः विराग गुप्ता (सुप्रीम कोर्ट के वकील)

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