AI Impact Summit में खुला बड़ा राज: AI ने पैदा किया एक और बड़ा खतरा, क्या आएगा वैश्विक जल संकट?

Edited By Updated: 25 Feb, 2026 03:37 PM

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आज की दुनिया में जब हम एआई (AI) से अपनी फोटो बनवाते हैं या कोई कठिन सवाल पूछते हैं, तो हमें लगता है कि यह तकनीक सिर्फ बिजली और इंटरनेट पर चल रही है। लेकिन इस डिजिटल चकाचौंध के पीछे एक कड़वा और सूखा सच छिपा है। AI न केवल इंसानों की नौकरियां छीनने का...

नेशनल डेस्क: आज की दुनिया में जब हम एआई (AI) से अपनी फोटो बनवाते हैं या कोई कठिन सवाल पूछते हैं, तो हमें लगता है कि यह तकनीक सिर्फ बिजली और इंटरनेट पर चल रही है। लेकिन इस डिजिटल चकाचौंध के पीछे एक कड़वा और सूखा सच छिपा है। AI न केवल इंसानों की नौकरियां छीनने का खतरा पैदा कर रहा है, बल्कि यह चुपचाप दुनिया के साफ पानी के भंडार को भी खत्म कर रहा है। 

नई दिल्ली के 'AI Impact Summit' में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि AI का बढ़ता इस्तेमाल आने वाले समय में वैश्विक जल संकट (Water Crisis) का सबसे बड़ा कारण बन सकता है। गूगल की हालिया 2024 एन्वायरमेंटल रिपोर्ट ने इस खौफनाक हकीकत पर मुहर लगा दी है, जिससे पता चलता है कि हमारे एक छोटे से 'कमांड' की कीमत कितनी भारी पड़ रही है।

गूगल के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, उनके डेटा सेंटर्स ने साल 2023 में लगभग 6.1 अरब गैलन शुद्ध पानी का सेवन किया। यह आंकड़ा पिछले साल की तुलना में 17 प्रतिशत ज्यादा है। पानी की यह मात्रा इतनी विशाल है कि इससे कई बड़े शहरों की प्यास बुझाई जा सकती है या हजारों एकड़ सूखे खेतों को साल भर सींचा जा सकता है। सिर्फ गूगल ही नहीं, चैटजीपीटी (ChatGPT) जैसी अन्य सेवाएं भी इसी रास्ते पर हैं। 

आपको याद होगा कि जब चैटजीपीटी ने अपना 'Ghibli' फीचर लॉन्च किया था, तो भारी लोड के कारण सर्वर इतने गर्म हो गए थे कि सैम ऑल्टमैन को खुद यूजर्स से इसे कम इस्तेमाल करने की अपील करनी पड़ी थी। दरअसल, AI जितना एडवांस होता जा रहा है, उसके प्रोसेसर उतनी ही अधिक गर्मी पैदा कर रहे हैं, और उस गर्मी को शांत करने के लिए अरबों लीटर पानी की बलि दी जा रही है।

मशीनों को ठंडा करने के लिए सिर्फ RO Water ही क्यों चाहिए?
अब सवाल यह उठता है कि आखिर इन मशीनों को ठंडा करने के लिए सिर्फ 'साफ पानी' (RO Water) ही क्यों चाहिए? क्या हम गंदा या रिसाइकिल किया हुआ पानी इस्तेमाल नहीं कर सकते? इसका तकनीकी कारण बहुत संवेदनशील है। AI डेटा सेंटर्स में लगे आधुनिक चिप्स और GPU इतने नाजुक होते हैं कि अगर उनमें साधारण या अनट्रीटेड पानी इस्तेमाल किया जाए, तो उसमें मौजूद कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे मिनरल्स चिप्स पर एक परत बना देंगे, जिससे वे और भी जल्दी गर्म होकर खराब हो जाएंगे। यही वजह है कि कंपनियां केवल शुद्ध आरओ वाटर का इस्तेमाल करती हैं। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इस प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले पानी का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा भाप बनकर उड़ जाता है, जिसे दोबारा रिसाइकिल करना लगभग नामुमकिन है।

भविष्य की तस्वीर और भी डरावनी नजर आ रही है 
क्लाइमेट साइंटिस्ट मॉर्गन स्टेनली की एक शोध रिपोर्ट बताती है कि साल 2028 तक एआई डेटा सेंटर्स में पानी की खपत वर्तमान स्तर से 11 गुना तक बढ़ सकती है। एक अनुमान के अनुसार, एक डेटा सेंटर में रोजाना जितना पानी इस्तेमाल होता है, उससे 50 हजार लोगों की दैनिक जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। जैसे-जैसे एआई सर्च इंजन और इमेज जनरेशन का क्रेज बढ़ रहा है, यह 'डिजिटल प्यास' प्राकृतिक संसाधनों पर असहनीय दबाव डाल रही है। अगर टेक कंपनियों और सरकारों ने जल्द ही कूलिंग के वैकल्पिक और टिकाऊ तरीके नहीं खोजे, तो वह दिन दूर नहीं जब इंसान तकनीक के मामले में तो अमीर होगा, लेकिन पीने के साफ पानी के लिए मोहताज हो जाएगा।

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