Edited By Pardeep,Updated: 25 Jan, 2026 01:13 AM

जब जिंदगी सबसे कठिन इम्तिहान लेती है, तब कुछ लोग टूट जाते हैं और कुछ लोग अपने प्यार और हिम्मत से इतिहास बना देते हैं। ओडिशा के संबलपुर से कटक तक का यह सफर ऐसी ही एक सच्ची कहानी है, जिसने इंसानियत, प्रेम और जज़्बे की ताकत दिखा दी।
इंटरनेशनल डेस्कः जब जिंदगी सबसे कठिन इम्तिहान लेती है, तब कुछ लोग टूट जाते हैं और कुछ लोग अपने प्यार और हिम्मत से इतिहास बना देते हैं। ओडिशा के संबलपुर से कटक तक का यह सफर ऐसी ही एक सच्ची कहानी है, जिसने इंसानियत, प्रेम और जज़्बे की ताकत दिखा दी।
यह कहानी है 75 साल के बाबू लोहार और उनकी 70 वर्षीय पत्नी ज्योति लोहार की, जिन्होंने साबित कर दिया कि असली ताकत मांसपेशियों में नहीं, बल्कि दिल में होती है।
लकवाग्रस्त हैं पत्नी, खुद से बैठना भी मुश्किल
ज्योति लोहार गंभीर पैरालिसिस (लकवा) की बीमारी से पीड़ित हैं। वे अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो सकतीं, अकेले बैठना भी उनके लिए बेहद कठिन है और शरीर का बड़ा हिस्सा निष्क्रिय हो चुका है।
बीमारी के साथ-साथ गरीबी ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दीं। इलाज के लिए न तो पर्याप्त पैसे थे और न ही कोई मजबूत सहारा। उम्र और बीमारी ने उनका पूरा जीवन बदल दिया था। पत्नी की देखभाल करना बाबू लोहार के लिए सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से भी बेहद कठिन था।
डॉक्टरों की सलाह, लेकिन पैसे नहीं थे
संबलपुर के एक अस्पताल में शुरुआती इलाज के बाद डॉक्टरों ने साफ कहा कि बेहतर इलाज के लिए कटक के SCB मेडिकल कॉलेज जाना जरूरी है। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल था: एंबुलेंस के पैसे नहीं, इलाज का खर्च जुटाना नामुमकिन और कोई सरकारी या निजी मदद तत्काल नहीं। ऐसे में ज्यादातर लोग हार मान लेते, लेकिन बाबू लोहार ने हिम्मत नहीं छोड़ी।
पुराना रिक्शा बना उम्मीद का सहारा
बाबू लोहार के पास एक ही रास्ता बचा— एक पुराना माल ढोने वाला रिक्शा। उन्होंने रिक्शे को जैसे-तैसे तैयार किया ,पत्नी को सावधानी से उस पर लिटाया और करीब 300 किलोमीटर की यात्रा पर निकल पड़े। यह सफर किसी चुनौती से कम नहीं था।
धूप, ठंड, कच्ची सड़कें… फिर भी नहीं रुके
इस लंबी यात्रा में बाबू लोहार ने तेज धूप में रिक्शा खींचा, रात की ठंडी हवाएं झेलीं, हाईवे और गांवों की टूटी-फूटी सड़कों से गुज़रे। 75 साल की उम्र में जहां सांस फूल जाती है, वहां वे हर कदम पर रिक्शा खींचते रहे। थकान बढ़ती गई, लेकिन पत्नी के इलाज की उम्मीद ने उन्हें रुकने नहीं दिया।
रास्ते में दिखी इंसानियत
इस मुश्किल सफर में उन्हें आम लोगों का सहारा भी मिला। किसी ने खाना दिया, किसी ने पानी तो किसी ने थोड़ी आर्थिक मदद। इन छोटे-छोटे सहयोगों ने बाबू लोहार को नई ऊर्जा दी और उनकी हिम्मत बनाए रखी।
कटक पहुंचकर मिला इलाज
कई दिनों की कठिन यात्रा के बाद बाबू लोहार अपनी पत्नी को कटक के SCB मेडिकल कॉलेज पहुंचाने में सफल रहे। वहां ज्योति लोहार का इलाज शुरू हुआ। हालत में धीरे-धीरे सुधार आया। इलाज के बाद दोनों ने संबलपुर लौटने का फैसला किया। ऐसा लगा कि अब संघर्ष थोड़ा कम होगा।
लेकिन किस्मत ने ली एक और परीक्षा…
घर लौटते वक्त उन्हें फिर से नई मुश्किलों का सामना करना पड़ा, जिससे यह साफ हो गया कि बाबू लोहार और ज्योति लोहार की जिंदगी अभी भी संघर्षों से भरी है। हालांकि, उनका हौसला अब भी अडिग है।
एक कहानी, जो सिखा जाती है बहुत कुछ
यह कहानी सिर्फ एक बुजुर्ग की नहीं, बल्कि पति के निस्वार्थ प्रेम की, इंसानी जज़्बे की और समाज की जिम्मेदारी की याद दिलाने वाली है। बाबू लोहार ने साबित कर दिया कि प्यार अगर सच्चा हो, तो उम्र, बीमारी और गरीबी भी हार मान लेती है।