Edited By Rohini Oberoi,Updated: 29 Apr, 2026 03:35 PM

महिलाओं के अधिकारों और मातृत्व सुरक्षा को लेकर मद्रास हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार तीसरी गर्भावस्था (Third Pregnancy) के आधार पर मातृत्व लाभ देने में कोई भेदभाव नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा कि चाहे...
नेशनल डेस्क। महिलाओं के अधिकारों और मातृत्व सुरक्षा को लेकर मद्रास हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार तीसरी गर्भावस्था (Third Pregnancy) के आधार पर मातृत्व लाभ देने में कोई भेदभाव नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा कि चाहे बच्चा पहला हो या तीसरा एक मां की शारीरिक और मेडिकल जरूरतें एक समान होती हैं।
जानें पूरा मामला
यह मामला शायी निशा नाम की एक महिला कर्मचारी की याचिका पर सामने आया। निशा ने अपनी तीसरी गर्भावस्था के लिए 2 फरवरी 2026 से एक साल की मातृत्व छुट्टी की अर्ज़ी दी थी। विलुप्पुरम के प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज ने सरकारी आदेश (G.O.) का हवाला देते हुए उनकी लंबी छुट्टी की अर्ज़ी खारिज कर दी और उन्हें 27 अप्रैल 2026 को ड्यूटी पर लौटने का आदेश दिया। वहीं सरकार का तर्क था कि तीसरे बच्चे के मामले में मातृत्व अवकाश को केवल 12 हफ्तों तक ही सीमित रखा जा सकता है।
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अदालत की सख्त टिप्पणी
जस्टिस आर. सुरेश कुमार और जस्टिस एन. सेंथिल कुमार की बेंच ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए कहा गर्भावस्था चाहे पहली हो या तीसरी, महिला को होने वाली शारीरिक समस्याएं और बच्चे की देखभाल की जरूरतें एक जैसी ही रहती हैं। इसमें भेदभाव का कोई तर्कसंगत आधार नहीं है। बेंच ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि राज्य की कार्यकारी शक्तियां मौजूदा कानूनों और मानवीय अधिकारों के खिलाफ नहीं जा सकतीं। कोर्ट ने कहा कि जो सरकार खुद को प्रगतिशील और महिला अधिकारों का रक्षक बताती है उसका ऐसा भेदभावपूर्ण रवैया उसके अपने ही नजरिए के खिलाफ है।
एक हफ्ते में छुट्टी देने का आदेश
हाई कोर्ट ने जिला न्यायपालिका को आदेश दिया है कि वे पुराने सरकारी नियमों में उलझे बिना, शायी निशा की अर्ज़ी पर दोबारा विचार करें। कोर्ट ने निर्देश दिया कि उन्हें पहली और दूसरी गर्भावस्था की तरह ही तीसरी बार भी पूरी मातृत्व छुट्टी दी जाए और यह प्रक्रिया एक हफ्ते के भीतर पूरी की जाए।