Edited By Pardeep,Updated: 16 Aug, 2026 12:45 AM

हैदराबाद के नालसार (NALSAR) यूनिवर्सिटी विवाद में चौतरफा घिरने और सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने आखिरकार कानून के छात्रों से माफी मांग ली है। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर "युवा...
नई दिल्ली/हैदराबाद: हैदराबाद के नालसार (NALSAR) यूनिवर्सिटी विवाद में चौतरफा घिरने और सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने आखिरकार कानून के छात्रों से माफी मांग ली है। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर "युवा मित्रों" को लिखे एक भावुक पत्र में मिश्रा ने स्पष्ट किया कि कानून के छात्रों को हमेशा अपने विचार व्यक्त करने की पूरी आजादी होनी चाहिए।
मनन कुमार मिश्रा ने अपने पत्र में लिखा, "यदि इस विवाद से जुड़े मेरे किसी भी शब्द या पत्र से हमारे कानून के छात्रों की भावनाओं को ठेस पहुंची है, तो मैं इसके लिए ईमानदारी से खेद व्यक्त करता हूं और माफी मांगता हूं"। उन्होंने आगे कहा कि खेद व्यक्त करना प्रतिष्ठा या अहंकार का विषय नहीं है, बल्कि यह इस बात की स्वीकारोक्ति है कि हमारे छात्रों की भावनाएं और चिंताएं मायने रखती हैं।
कैसे शुरू हुआ यह पूरा विवाद?
यह विवाद तब शुरू हुआ जब हैदराबाद के नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च (NALSAR) के दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को आमंत्रित किया गया था। इस निमंत्रण के विरोध में विश्वविद्यालय के 450 से अधिक छात्रों ने प्रशासन को एक ज्ञापन सौंपा था। छात्रों ने 20 जुलाई के संसद मार्च के दौरान पुलिस की कथित ज्यादतियों और हाल के कुछ न्यायिक घटनाक्रमों पर चिंता व्यक्त की थी।
इस विरोध प्रदर्शन के बाद, बीसीआई (BCI) ने 13 अगस्त को एक कड़ा आदेश जारी करते हुए राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया कि वे नालसार के 2026 बैच के छात्रों का नामांकन (Enrolment) वकील के रूप में न करें। इसके साथ ही प्रदर्शन के पीछे के लोगों की पहचान करने के लिए एक जांच के भी आदेश दिए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार और भारी विरोध के बाद पीछे हटी BCI
इस फैसले के बाद देशभर में बीसीआई की तीखी आलोचना हुई। मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच गया, जहां सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने बीसीआई के इस कदम को "बिल्कुल अनावश्यक" करार दिया और कहा कि छात्रों को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि बीसीआई या राज्य बार काउंसिल के इशारे पर नालसार के छात्रों या फैकल्टी के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। भारी विरोध और अदालती फटकार के बाद बीसीआई ने अपना फैसला बदलते हुए छात्रों के नामांकन पर लगी रोक को हटा लिया और पूरी कार्यवाही को बंद कर दिया।
इस्तीफे की मांग और कानूनी अधिकार क्षेत्र पर उठे सवाल
इस पूरे प्रकरण ने बीसीआई के अधिकारों पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत किसी भी व्यक्ति को बार में नामांकित करने का प्राथमिक अधिकार राज्य बार काउंसिलों के पास होता है, न कि सीधे बीसीआई के पास। चूंकि नालसार के छात्र अभी वकील के रूप में पंजीकृत ही नहीं हुए थे, इसलिए उनके नामांकन पर सामूहिक रोक लगाने के फैसले को अवैध और अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया गया।
इस बीच, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी बीसीआई अध्यक्ष के इस्तीफे की मांग तेज हो गई है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सह-संयोजक सौरव दास ने मनन कुमार मिश्रा से नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की मांग की है। वहीं, एआईएमआईएम (AIMIM) सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी बीसीआई और मनन मिश्रा की भूमिका पर तीखे सवाल उठाए हैं।
मिश्रा की अपील: विवाद को राजनीतिक रंग न दें छात्र
अपने पत्र के अंत में मनन कुमार मिश्रा ने छात्रों से इस विवाद को संवाद और आपसी सम्मान के जरिए सुलझाने की अपील की है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस मामले को राजनीतिक या बाहरी रंग नहीं दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि देश के कानून के छात्र बेहद समझदार और स्वतंत्र सोच रखने वाले नागरिक हैं और वे किसी भी बाहरी प्रभाव के बिना तथ्यों के आधार पर अपना स्वतंत्र निर्णय लेने में पूरी तरह सक्षम हैं।