Edited By Tanuja,Updated: 02 Nov, 2026 03:41 PM

लखनऊ के SGPGI में डॉक्टरों ने 27 वर्षीय दिव्या वर्मा के पेट से करीब 2 किलो का ट्यूमर निकाला। ट्यूमर से प्रभावित शरीर की सबसे बड़ी नस का हिस्सा हटाकर गाय के दिल की झिल्ली से नई नस बनाई गई। सर्जरी के बाद युवती की दोनों किडनी सामान्य रूप से काम कर रही...
New Delhi: भारत में डॉक्टरों ने एक ऐसा जटिल ऑपरेशन किया है, जिसमें 27 वर्षीय युवती के पेट से करीब 2 किलो का ट्यूमर निकालने के साथ शरीर की सबसे बड़ी नस का प्रभावित हिस्सा भी हटाना पड़ा। ट्यूमर किडनी को खून पहुंचाने वाली नसों से भी जुड़ा था। ऐसे में दोनों किडनी को बचाना बड़ी चुनौती थी। लेकिन डॉक्टरों ने गाय की मदद से उस युवती की जान बचा कर नया इतिहास रच दिया है। मामला उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के पडरौना स्थित सिमरिया बाजार, हनुमानगंज की रहने वाली 27 वर्षीय दिव्या वर्मा का है। वह करीब एक साल से पेट में बढ़ रहे ट्यूमर की समस्या से परेशान थीं। उन्होंने कई अस्पतालों में इलाज कराने की कोशिश की, लेकिन ट्यूमर की गंभीर स्थिति और ऑपरेशन में जान जाने के खतरे को देखते हुए डॉक्टरों ने सर्जरी करने से इनकार कर दिया। आखिरकार दिव्या इलाज की उम्मीद लेकर लखनऊ स्थित संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (SGPGI) पहुंचीं।
SGPGI के यूरोलॉजी विभाग के यूरोलॉजिस्ट और किडनी प्रत्यारोपण विशेषज्ञ प्रो. संजय सुरेखा के मुताबिक, जांच में युवती के पेट के दाहिने हिस्से में करीब 20 सेंटीमीटर का ट्यूमर मिला। इसका वजन लगभग 2 किलो था। ट्यूमर शरीर की सबसे बड़ी नस IVC (इंफीरियर वेना कावा) से बुरी तरह चिपका हुआ था। इसके अलावा, इसका जुड़ाव किडनी को खून पहुंचाने वाली नसों से भी था। IVC वह प्रमुख नस है, जो पैरों, किडनी, लिवर और आंतों से खून को वापस दिल तक पहुंचाती है। ट्यूमर को निकालने के लिए डॉक्टरों को इस नस का प्रभावित हिस्सा भी हटाना पड़ा। सबसे बड़ी चुनौती दोनों किडनी को सुरक्षित रखना और शरीर में खून का प्रवाह सामान्य बनाए रखना था।
डॉक्टरों की टीम ने पहले करीब 2 किलो का ट्यूमर निकाला। इसके बाद IVC के प्रभावित हिस्से को हटाकर उसकी जगह विशेष ग्राफ्ट तैयार कर नई नस बनाई और उसे शरीर में प्रत्यारोपित किया। सर्जरी के बाद युवती की दोनों किडनी सामान्य रूप से काम कर रही हैं। इसके लिए बोवाइन पेरिकार्डियम यानी गाय के दिल को ढकने वाली झिल्ली से बने विशेष ग्राफ्ट का इस्तेमाल किया गया। विदेश में निर्मित इस ग्राफ्ट की कीमत करीब 50 हजार रुपए बताई गई है। डॉक्टरों ने इससे लगभग 8×4 सेंटीमीटर का पाइप जैसा ढांचा तैयार किया और उसे नई आईवीसी के रूप में लगाया। इसके बाद बाईं किडनी की नस को नई आईवीसी से और दाईं किडनी की नस को गोनाडल वेन से जोड़ दिया गया। इस तरह शरीर में खून के प्रवाह के लिए नई व्यवस्था बनाई गई।
जरा सी चूक पड़ सकती थी भारी
यह सर्जरी कई वजहों से बेहद जोखिम भरी थी। ऑपरेशन के दौरान आईवीसी फटने पर बहुत अधिक खून बह सकता था, जिससे मरीज की जान को खतरा हो सकता था। वहीं, किडनी की नसों को नुकसान पहुंचने से दोनों किडनी काम करना बंद कर सकती थीं। इसके अलावा नई नस में खून का थक्का जमने का भी खतरा था। ऐसा होने पर पैरों में सूजन आ सकती थी और यदि थक्का फेफड़ों तक पहुंच जाता तो स्थिति जानलेवा हो सकती थी। इसी खतरे को देखते हुए सर्जरी के बाद युवती को खून का थक्का बनने से रोकने वाली विशेष दवाएं दी जा रही हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, सर्जरी के बाद दिव्या की दोनों किडनी सामान्य रूप से काम कर रही हैं। हालांकि, नई नस में खून का प्रवाह ठीक बना रहे और थक्का न जमे, इसके लिए उनकी लगातार निगरानी की जा रही है। उन्हें जरूरी दवाएं भी दी जा रही हैं।