Edited By Tanuja,Updated: 27 May, 2026 06:58 PM

पूर्व मोसाद एजेंट सगीव असुलिन ने कहा है कि भारत और इजराइल को सूचना युद्ध और झूठे नैरेटिव के खिलाफ मिलकर काम करना चाहिए। उन्होंने “आठवें मोर्चे” को सबसे बड़ा खतरा बताया, जहां सोशल मीडिया और प्रचार के जरिए देशों की छवि और जनमत को प्रभावित किया जाता है।
International Desk: इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद के पूर्व अधिकारी सागिव असुलिन (Sagiv Asulin) ने भारत और इजराइल के बीच गहरे सहयोग की जरूरत पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि दोनों लोकतांत्रिक देशों को मिलकर “आठवें मोर्चे” यानी सूचना और नैरेटिव युद्ध के खिलाफ लड़ना होगा। सगीव असुलिन ने कहा कि आज की दुनिया में लड़ाई सिर्फ हथियारों से नहीं बल्कि सोशल मीडिया, डिजिटल प्रचार और झूठी जानकारी के जरिए भी लड़ी जा रही है। उन्होंने इसे “जनधारणा की जंग” बताया। उनके मुताबिक, यह नया मोर्चा लोगों की सोच, अंतरराष्ट्रीय छवि और राजनीतिक माहौल को प्रभावित करने का काम करता है। उन्होंने कहा कि यह खतरा खासकर युवाओं को निशाना बनाता है।
असुलिन ने कहा कि भारत और इजराइल दोनों इस तरह के प्रचार युद्ध का सामना कर रहे हैं। उन्होंने भारत के “ऑपरेशन सिंदूर” का उदाहरण देते हुए कहा कि सैन्य कार्रवाई के बाद भारत के खिलाफ भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नैरेटिव की लड़ाई देखने को मिली। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और इजराइल दुनिया का एकमात्र यहूदी लोकतंत्र है। इसी वजह से दोनों देशों के बीच मूल्य आधारित साझेदारी बहुत मजबूत है। असुलिन ने कहा कि इजराइल भारत को केवल रणनीतिक साझेदार नहीं बल्कि भरोसेमंद दोस्त मानता है। उन्होंने दावा किया कि इजराइल ने हमेशा भारत के साथ महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी साझा की है और आगे भी करता रहेगा। उन्होंने “आठवें मोर्चे” को आधुनिक दौर का सबसे खतरनाक युद्ध क्षेत्र बताया। उनके अनुसार यह लड़ाई विश्वविद्यालयों, मीडिया प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लड़ी जा रही है।
असुलिन ने कहा कि यह नैरेटिव युद्ध कट्टरपंथी विचारधाराओं और अतिवादी राजनीतिक समूहों से भी प्रभावित हो रहा है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका, यूरोप, भारत और इजराइल सभी इस चुनौती का सामना कर रहे हैं। उन्होंने 7 अक्टूबर 2023 को इजराइल पर हुए हमास हमले का भी जिक्र किया। असुलिन के मुताबिक, उस हमले के बाद सिर्फ सैन्य संघर्ष नहीं बल्कि वैश्विक जनमत की लड़ाई भी शुरू हो गई थी। उन्होंने कहा कि आज किसी भी देश के लिए केवल सैन्य ताकत काफी नहीं है। सूचना, प्रचार और डिजिटल नैरेटिव को संभालना भी उतना ही जरूरी हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में “सूचना युद्ध” और “डिजिटल प्रचार” वैश्विक राजनीति और सुरक्षा का बड़ा हिस्सा बन सकते हैं।