भारत के ये 5 मंदिर, जहां प्रसाद घर लाना माना जाता है अशुभ, जानिए वजह

Edited By Updated: 21 Jan, 2026 11:25 AM

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भारत की आध्यात्मिक धरा अपनी अद्भुत मान्यताओं और रहस्यों के लिए वैश्विक स्तर पर विख्यात है। यहाँ आस्था के ऐसे केंद्र भी हैं जहाँ सदियों से चली आ रही परंपराएं तार्किक सोच को भी चुनौती देती हैं। आमतौर पर भक्त किसी भी मंदिर से प्रसाद स्वरूप कुछ अंश अपने...

नेशनल डेस्क: भारत की आध्यात्मिक धरा अपनी अद्भुत मान्यताओं और रहस्यों के लिए वैश्विक स्तर पर विख्यात है। यहाँ आस्था के ऐसे केंद्र भी हैं जहाँ सदियों से चली आ रही परंपराएं तार्किक सोच को भी चुनौती देती हैं। आमतौर पर भक्त किसी भी मंदिर से प्रसाद स्वरूप कुछ अंश अपने घर लाना सौभाग्य मानते हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति में कुछ ऐसे अनूठे मंदिर भी हैं जहाँ से प्रसाद घर ले जाना वर्जित है। लोक मान्यताओं के अनुसार, इन स्थानों की ऊर्जा और नियम इतने विशिष्ट हैं कि यहाँ का प्रसाद मंदिर की सीमा से बाहर ले जाने पर जीवन में नकारात्मकता या अनहोनी की आशंका बनी रहती है।

आइए जानते हैं उन रहस्यमयी मंदिरों के बारे में जहां 'प्रसाद' को केवल मंदिर परिसर तक ही सीमित रखना अनिवार्य है:

मेहंदीपुर बालाजी (राजस्थान): बाधाओं से मुक्ति का केंद्र

हनुमान जी का यह स्वरूप नकारात्मक शक्तियों और ऊपरी बाधाओं के निवारण के लिए जाना जाता है। यहाँ बूंदी के लड्डू और भैरव बाबा को उड़द-चावल का भोग लगाया जाता है।

नियम: ऐसी प्रबल मान्यता है कि यहाँ चढ़ाया गया या मिला हुआ प्रसाद कभी भी खाया नहीं जाता और न ही उसे घर लाया जाता है। कहा जाता है कि घर लाते समय प्रसाद के साथ नकारात्मक ऊर्जाएं भी आपके पीछे आ सकती हैं, जिससे समस्याएं बढ़ सकती हैं।

काल भैरव मंदिर (उज्जैन): जहां देवता पीते हैं मदिरा

उज्जैन के इस प्राचीन मंदिर में भगवान काल भैरव को मदिरा (शराब) अर्पित की जाती है। यह अपने आप में भारत की सबसे अनोखी परंपराओं में से एक है।

सावधानी: यहां चढ़ने वाली मदिरा या अन्य सामग्री को घर ले जाना सख्त मना है। माना जाता है कि महाकाल की नगरी के इस कोतवाल का प्रसाद घर ले जाने से पारिवारिक शांति भंग हो सकती है और कुछ अशुभ घटित होने का डर रहता है।

कामाख्या शक्तिपीठ (असम): अघोषित ऊर्जा का स्रोत

गुवाहाटी की नीलांचल पहाड़ियों पर स्थित यह मंदिर तांत्रिक साधना और देवी के रजस्वला स्वरूप की पूजा के लिए प्रसिद्ध है। वर्ष में तीन दिन यहाँ अंबुवाची मेले के दौरान मंदिर के कपाट बंद रहते हैं।

विशेषता: इस मंदिर की दिव्यता और यहाँ की ऊर्जा को अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, यहाँ के कुछ विशेष प्रकार के प्रसाद को ग्रहण करना या बाहर ले जाना भक्त के जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियां पैदा कर सकता है।

नैना देवी मंदिर (हिमाचल प्रदेश): शक्तिपीठ की मर्यादा

हिमाचल की गोद में बसे इस शक्तिपीठ में विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। यहाँ का वातावरण सात्विक और ऊर्जावान है।

मान्यता: भक्तों को सलाह दी जाती है कि जो भी प्रसाद उन्हें प्राप्त हो, उसे मंदिर की देहरी लांघने से पहले ही ग्रहण कर लें। इसे घर ले जाने पर इसके दिव्य प्रभाव के विपरीत नकारात्मक असर होने की लोककथाएं प्रचलित हैं।

कोटिलिंगेश्वर मंदिर (कर्नाटक): एक करोड़ शिवलिंगों की भूमि

कोलार जिले में स्थित यह मंदिर अपने आप में अद्वितीय है, जहाँ करोड़ों की संख्या में शिवलिंग स्थापित हैं।

धार्मिक मत: शास्त्रों के एक मत के अनुसार, शिवलिंग पर चढ़ाया गया प्रसाद (चंडेश्वर का भाग) सीधे तौर पर ग्रहण नहीं करना चाहिए। इसी कारण इस मंदिर में प्रसाद को केवल प्रतीकात्मक रूप में देखा जाता है, उसे घर ले जाना या भोजन के रूप में सेवन करना वर्जित माना गया है।

डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक मान्यताओं, लोककथाओं और परंपराओं पर आधारित है। इसमें दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल सामान्य सूचना देना है। इसका किसी भी प्रकार के वैज्ञानिक, तर्कसंगत या कानूनी प्रमाण से सीधा संबंध नहीं है।

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