Edited By Anu Malhotra,Updated: 29 Jan, 2026 01:24 PM

कालका जी मंदिर के पास पली-बढ़ी श्यामली की दुनिया बचपन से ही भूख और मौसम के इर्द-गिर्द घूमती रही। छोटे कपड़े, उलझे बाल और अनाथ का अनुभव—यही उसकी पहचान थी। जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, उसमें डर भी शामिल हो गया: रात का डर, लोगों का डर, और अनचाहे नींद का डर।
नेशनल डेस्क: कालका जी मंदिर के पास पली-बढ़ी श्यामली की दुनिया बचपन से ही भूख और मौसम के इर्द-गिर्द घूमती रही। छोटे कपड़े, उलझे बाल और अनाथ का अनुभव—यही उसकी पहचान थी। जैसे-जैसे उम्र बढ़ी, उसमें डर भी शामिल हो गया: रात का डर, लोगों का डर, और अनचाहे नींद का डर।
बेघर महिलाएं सिर्फ भूख या ठंड का सामना नहीं करतीं; उन्हें समाज, हिंसा और नज़रअंदाज़ होने का भी बोझ उठाना पड़ता है। अधसोयापन और चुना हुआ जागरण उनकी ज़रूरत बन गया है। रातभर जागने के लिए वे अपने शरीर और मन को तरह-तरह से संभालती हैं—कभी खुद को चोट पहुंचाकर नींद रोकती हैं, कभी लगातार चलती रहती हैं।
न्यूज चैनल आजतक को दिए इंटरव्यू में श्यामली बताती हैं कि बचपन में उन्हें दिन-रात बस खुद को सुरक्षित रखने की चिंता रहती थी। कालका जी मंदिर में जो भी आता, वह उनके पीछे-पीछे घूम जाता। कभी भंडारे में खाना मिल जाता, कभी नहीं। कभी दया या पैसे मिलते, कभी लोगों की हिकारत झेलनी पड़ती। जब वह सोती, कोई बगल में हाथ डाल देता, पकड़ लेता या मारपीट करता। उस उम्र में विरोध करना मुश्किल था, इसलिए उन्हें खुद को इतना छोटा करना पड़ता कि कोई देख न पाए।
धीरे-धीरे नशा और चोरी जैसी बुराइयों में उनका कदम बढ़ गया। बस नंबर 429 में कई जेबें काटीं, गैंग में शामिल हो गईं। डर और हिंसा के बीच उन्होंने खुद को मजबूरन बदल लिया। लेकिन जिंदगी ने और भी मुश्किल मोड़ दिए। नशे में एक व्यक्ति ने उन्हें मथुरा के किसी गांव में बेच दिया। उस व्यक्ति ने खुद को उनका पति बताया, और 25,000 रुपए के बदले उनका शोषण किया।
उसके बाद प्रेग्नेंसी, बच्चों का अलग होना और लगातार मारपीट ने श्यामली की जिंदगी को और कठिन बना दिया। उसके बच्चों को कभी मां का प्यार नहीं मिला, बल्कि उन्हें किसी और के हाथों बड़ा किया गया। इसके बावजूद श्यामली ने हार नहीं मानी।
धीरे-धीरे वह अपनी ज़िम्मेदारी को समझने लगी। बच्चों के लिए बेहतर इंसान बनने की ठानी और शेल्टर होम की तरफ लौट आई। उसका पति अब भी पुराने अतीत में डूबा है, लेकिन श्यामली अपने बच्चों और सपनों पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
आज लगभग 30 साल की श्यामली का सपना है कि उसके और उसके बच्चों का एक घर हो—जहां वह अपनी मर्जी से सबकुछ कर सके, दीवारों पर बच्चे अपनी कला दिखा सकें, और वह खुद रसोई में उनका पसंदीदा नाश्ता बना सके। उसने फरीदाबाद में घर खरीदा है, जिसकी कीमत 12.5 लाख है। अब वह धीरे-धीरे किश्तें चुकाते हुए अपने घर को अपना बना रही है।
श्यामली की आंखों में अपने घर और बच्चों के साथ सुकून का सपना चमक रहा है। उसका सफेद स्टोल और सफेद परदे, फूलदार कपड़े पहने बच्चे, दीवार पर बारहखड़ी की लिखाई और मां का प्यार—ये सब अब केवल ख्वाब नहीं, बल्कि हकीकत बनने की राह पर हैं।