Edited By Radhika,Updated: 31 Jan, 2026 01:07 PM

भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों (HEIs) में जातिगत भेदभाव को जड़ से खत्म करने के लिए UGC Regulations, 2026 लागू कर दिए गए हैं। इन नियमों के तहत अब हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में एक 'इक्वल अपॉर्चुनिटी सेंटर' (EOC) और 'इक्विटी कमेटी' बनाना जरुरी होगा।
नेशनल डेस्क: भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों (HEIs) में जातिगत भेदभाव को जड़ से खत्म करने के लिए UGC Regulations, 2026 लागू कर दिए गए हैं। इन नियमों के तहत अब हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में एक 'इक्वल अपॉर्चुनिटी सेंटर' (EOC) और 'इक्विटी कमेटी' बनाना जरुरी होगा।
क्या हैं UGC के नए नियम?
UGC ने साफ किया है कि कैंपस में किसी भी छात्र, शिक्षक या स्टाफ के साथ उनकी जाति के आधार पर भेदभाव बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
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शिकायत निवारण: हर संस्थान को जातिगत भेदभाव की शिकायतों के लिए अलग कमेटी बनानी होगी।
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त्वरित कार्रवाई: शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर कमेटी की बैठक और 15 दिनों के भीतर रिपोर्ट देना अनिवार्य है।
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सख्त दंड: नियमों का पालन न करने वाले संस्थानों की मान्यता रद्द हो सकती है या उनके फंड रोके जा सकते हैं।

आरक्षण का मौजूदा ढांचा
भारत के संविधान में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था है। वर्तमान में शिक्षा क्षेत्र में आरक्षण का गणित कुछ इस प्रकार है:
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श्रेणी
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आरक्षण%
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अनुसूचित जाति (SC)
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15%
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अनुसूचित जनजाति (ST)
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7.5%
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अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)
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27%
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कुल (संवैधानिक कोटा)
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49.5%
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आर्थिक कमजोर वर्ग (EWS)
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10%
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इंदिरा साहनी केस और 50% की सीमा:
1992 के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% तय की थी। हालांकि, 2019 में आए EWS आरक्षण (10%) को कोर्ट ने इस सीमा से अलग रखते हुए संवैधानिक रूप से वैध माना है।
बढ़ते नामांकन: क्या कहते हैं आंकड़े?
शिक्षा मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट (AISHE) के अनुसार, पिछले एक दशक में आरक्षित वर्गों की भागीदारी में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है।
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वर्ष 2014-15 के मुकाबले 2024-25 तक SC, ST और OBC छात्रों के नामांकन में भारी उछाल आया है।
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उच्च शिक्षा में इन वर्गों के छात्रों की कुल संख्या अब लगभग 4.13 करोड़ तक पहुंच गई है।
विरोध का स्वर: जहां एक तरफ इन नियमों को सामाजिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है, वहीं कुछ छात्र संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि इससे कैंपस में विभाजन बढ़ सकता है और 'जनरल कैटेगरी' के छात्रों के लिए अलग सुरक्षा तंत्र की कमी है। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इन नए नियमों पर केंद्र और UGC से जवाब मांगा है।