Edited By Ramanjot,Updated: 27 Jan, 2026 08:51 PM

महाराष्ट्र में भाषा को लेकर राजनीति एक बार फिर सुर्खियों में है। नगर निगम चुनावों के दौरान हिंदी को अनिवार्य बनाने के फैसले ने जहां बड़ा विवाद खड़ा किया था, वहीं अब राज्य सरकार ने मराठी भाषा के पालन को लेकर कड़ा रुख अपना लिया है।
नेशनल डेस्क: महाराष्ट्र में भाषा को लेकर राजनीति एक बार फिर सुर्खियों में है। नगर निगम चुनावों के दौरान हिंदी को अनिवार्य बनाने के फैसले ने जहां बड़ा विवाद खड़ा किया था, वहीं अब राज्य सरकार ने मराठी भाषा के पालन को लेकर कड़ा रुख अपना लिया है। सरकार ने साफ कर दिया है कि जो स्कूल मराठी भाषा को अनिवार्य विषय के तौर पर लागू नहीं कर रहे हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई तय है।
2020 से लागू है नियम, फिर भी अनदेखी
राज्य सरकार ने 1 मार्च 2020 को अधिसूचना जारी कर महाराष्ट्र के सभी स्कूलों में मराठी भाषा को अनिवार्य विषय घोषित किया था। यह नियम सरकारी और निजी, अनुदानित और गैर-अनुदानित, साथ ही CBSE, ICSE और IB जैसे सभी बोर्ड से जुड़े स्कूलों पर लागू है। इसके बावजूद हालिया जांच और शिकायतों में सामने आया है कि कई प्रतिष्ठित निजी स्कूल अब भी इस आदेश का पालन नहीं कर रहे हैं और मराठी को पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया गया है।
नियम तोड़ने पर होगी कार्रवाई
मामला उजागर होने के बाद राज्य सरकार ने अब स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं। जिन शिक्षण संस्थानों में मराठी भाषा नहीं पढ़ाई जा रही है, उनके खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे।
शिक्षा आयुक्त को आदेश दिया गया है कि वे पूरे राज्य में जांच कर रिपोर्ट तैयार करें और नियमों की अनदेखी करने वाले स्कूलों की सूची बनाकर आगे की कार्रवाई सुनिश्चित करें।
अमित ठाकरे की पहल के बाद हरकत में आया प्रशासन
इस मुद्दे को लेकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के नेता अमित ठाकरे ने हाल ही में सरकार को एक ज्ञापन सौंपा था। उन्होंने 2020 के सरकारी आदेश का हवाला देते हुए मांग की थी कि मराठी भाषा को लेकर ढिलाई खत्म की जाए। इसके बाद प्रशासन सक्रिय हुआ और अब अधिकारियों को तत्काल जांच और कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।
क्या फिर गरमाएगी भाषा की राजनीति?
सरकार के इस फैसले के बाद यह कयास लगाए जा रहे हैं कि महाराष्ट्र में भाषा को लेकर सियासी माहौल फिर गरमा सकता है। नगर निगम चुनावों के दौरान मराठी बनाम हिंदी पर पहले ही तीखी बहस हो चुकी है। अब स्कूलों पर कार्रवाई शुरू होने से यह मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ सकता है।