Edited By Ramanjot,Updated: 18 Feb, 2026 10:23 PM

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के हालिया बयान के बाद देश की सियासत और सामाजिक हलकों में बहस तेज हो गई है।
नेशनल डेस्क: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के हालिया बयान के बाद देश की सियासत और सामाजिक हलकों में बहस तेज हो गई है। 17 फरवरी को लखनऊ में दिए गए अपने संबोधन में उन्होंने भारतीय मुसलमानों की “घर वापसी” का जिक्र किया था। इस बयान को लेकर कई मुस्लिम संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई है और इसे भेदभावपूर्ण करार दिया है।
इसी क्रम में मौलाना अरशद मदनी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। जो जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष हैं, उन्होंने कहा कि देश के मुसलमान अपने धर्म और पहचान के साथ मजबूती से खड़े हैं और उन्हें किसी भी तरह से डराया या दबाया नहीं जा सकता।
सोशल मीडिया पोस्ट से दिया जवाब
मदनी ने सोशल मीडिया के माध्यम से कहा कि पिछले कई दशकों में कभी इस तरह की बात सार्वजनिक तौर पर नहीं कही गई, लेकिन अब खुले मंचों से 20 करोड़ मुसलमानों की “घर वापसी” की चर्चा की जा रही है। उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है मानो कुछ लोग ही देशभक्ति के असली पैमाने तय करने लगे हों।
उन्होंने यह भी कहा कि जो विचार देश को अशांति, विभाजन और नफरत की ओर ले जाए, वह राष्ट्रहित में नहीं हो सकता। उनके अनुसार, संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है और किसी भी समुदाय को निशाना बनाना उसके मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
संविधान और भाईचारे की बात
मदनी ने आरोप लगाया कि देश में नफरत का माहौल बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि हिंसा और लिंचिंग जैसी घटनाएं चिंता का विषय हैं और धर्म के नाम पर किसी भी तरह की आक्रामकता स्वीकार्य नहीं हो सकती।
उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की एकता और अखंडता तभी सुरक्षित रह सकती है जब संविधान की भावना और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का सम्मान किया जाए। जमीयत उलेमा-ए-हिंद हमेशा सांप्रदायिक सद्भाव की पक्षधर रही है और आगे भी रहेगी।
विवाद के बाद तेज हुई बहस
भागवत के बयान और उस पर आई प्रतिक्रियाओं के बाद राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के बीच चर्चा और तेज हो गई है। कई समूह इसे सामाजिक सौहार्द से जुड़ा गंभीर मुद्दा बता रहे हैं। आने वाले दिनों में इस विषय पर और बयानबाजी होने की संभावना है।