अब पेट्रोल-डीजल नहीं, 'पानी' से चलेंगी गाड़ियां, इस विदेशी कंपनी का बड़ा दावा, जानिए क्या है फॉर्मूला

Edited By Updated: 17 May, 2026 08:49 PM

now vehicles will run on  water  not petrol or diesel

मिडिल ईस्ट युद्द के बाद दुनियाभर में पेट्रोल-डीजल की किल्लत देखने को मिली। इस बीच एक विदेशी कंपनी ने एक ऐसा बयान  दिया है, जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है। मोनको की कंपनी FOWE Eco Solutions ने दावा है कि पानी का इस्तेमाल कर के ईंधन की खपत को...

नेशनल डेस्क : मिडिल ईस्ट युद्द के बाद दुनियाभर में पेट्रोल-डीजल की किल्लत देखने को मिली। इस बीच एक विदेशी कंपनी ने एक ऐसा बयान  दिया है, जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है। मोनको की कंपनी FOWE Eco Solutions ने दावा है कि पानी का इस्तेमाल कर के ईंधन की खपत को 10 प्रतिशत तक घटाया जा सकता है। 

यह दावा ऐसे समय में सामने आया है, जब India अपनी जरूरत का करीब 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में ईंधन बचाने वाली कोई भी तकनीक देश की अर्थव्यवस्था और रुपये की मजबूती पर बड़ा असर डाल सकती है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई बार ईंधन बचत और ऊर्जा दक्षता पर जोर दे चुके हैं।

आखिर कैसे काम करती है यह तकनीक?

कंपनी के मुताबिक उसकी पेटेंट तकनीक “कैविटेक फ्यूल इमल्शन” ईंधन और पानी को एक खास प्रक्रिया के जरिए मिलाती है। इस दौरान ईंधन के भीतर पानी की बेहद सूक्ष्म बूंदें तैयार होती हैं। जब ईंधन जलता है तो ये बूंदें “माइक्रो एक्सप्लोजन” पैदा करती हैं, जिससे ईंधन अधिक प्रभावी तरीके से जलने लगता है।

कंपनी का दावा है कि इस प्रक्रिया से ईंधन की खपत कम होती है और धुएं का उत्सर्जन भी घटता है। खास बात यह बताई जा रही है कि इस तकनीक को अपनाने के लिए इंजन में बड़े बदलाव की जरूरत नहीं पड़ती और इसे मशीनें बंद किए बिना भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

ईंधन बचत से लेकर प्रदूषण घटाने तक का दावा

कंपनी और स्वतंत्र परीक्षण रिपोर्ट्स के अनुसार, इस तकनीक से बॉयलर और समुद्री इंजनों में 6 से 10 प्रतिशत तक ईंधन बचत दर्ज की गई है। वहीं भारत के कुछ रिफाइनरी और इस्पात संयंत्रों में हुए परीक्षणों में 3.6 से 6 प्रतिशत तक की बचत सामने आई।

FOWE Eco Solutions का दावा है कि इस तकनीक से NOx और SOx जैसे हानिकारक उत्सर्जन में 40 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। इसके अलावा बॉयलर और भट्टियों में गंदगी कम जमा होने से रखरखाव का खर्च भी घट सकता है।

हालांकि, यह तकनीक अभी आम वाहनों में बड़े स्तर पर इस्तेमाल नहीं हो रही है। फिलहाल इसका परीक्षण औद्योगिक इकाइयों, जहाजों और बिजली संयंत्रों में किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तकनीक बड़े पैमाने पर सफल साबित होती है, तो आने वाले समय में ईंधन बचत के क्षेत्र में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

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