न बिजली बिल, न ही पानी का झंझट, उल्टा मिलेंगे लाखों रुपए... आप भी उठा सकते हैं इस बिल्डिंग का लाभ

Edited By Updated: 11 Feb, 2026 06:17 PM

people get paid to live in this building

मुंबई को देश का सबसे महंगा रियल एस्टेट बाजार माना जाता है, जहां घर खरीदना ही आम आदमी के लिए बड़ी उपलब्धि समझी जाती है। ऐसे शहर में अगर कोई कहे कि एक सोसायटी अपने फ्लैट मालिकों से मेंटेनेंस लेने के बजाय उन्हें हर साल लाखों रुपये देती है, तो यह सुनकर...

नेशनल डेस्क : मुंबई को देश का सबसे महंगा रियल एस्टेट बाजार माना जाता है, जहां घर खरीदना ही आम आदमी के लिए बड़ी उपलब्धि समझी जाती है। ऐसे शहर में अगर कोई कहे कि एक सोसायटी अपने फ्लैट मालिकों से मेंटेनेंस लेने के बजाय उन्हें हर साल लाखों रुपये देती है, तो यह सुनकर हैरानी होना स्वाभाविक है। लेकिन दक्षिण मुंबई से जुड़ा एक ऐसा ही दावा इन दिनों सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

कफ परेड की प्रीमियम सोसायटी को लेकर वायरल हुआ वीडियो

दक्षिण मुंबई के पॉश इलाके कफ परेड स्थित ‘जॉली मेकर’ नामक रिहायशी परिसर को लेकर यह चर्चा शुरू हुई। रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर विषयों पर वीडियो बनाने वाले कंटेंट क्रिएटर विशाल भार्गव ने एक वीडियो में दावा किया कि इस सोसायटी में रहने वाले फ्लैट मालिकों को सालाना लगभग 2.5 से 3 लाख रुपये तक दिए जाते हैं। उनके अनुसार यहां निवासियों को नियमित मेंटेनेंस शुल्क नहीं देना पड़ता, बल्कि सोसायटी उन्हें “डिविडेंड” के रूप में राशि वितरित करती है।

दशकों पुराना मॉडल बताया जा रहा वजह

बताया जा रहा है कि इस आर्थिक मॉडल की नींव 1970 के दशक में रखी गई थी। उस समय बिल्डर ने खरीदारों को एक विशेष प्रस्ताव दिया था, जिसके तहत अतिरिक्त भुगतान कर नरीमन पॉइंट स्थित एक व्यावसायिक संपत्ति में भी हिस्सेदारी दी गई। दावा है कि वही कमर्शियल बिल्डिंग आज इस मॉडल की रीढ़ है। कहा जा रहा है कि उस संपत्ति से हर महीने भारी किराया आता है, जिससे सोसायटी के रखरखाव और अन्य खर्च पूरे हो जाते हैं।

बची रकम बांटने का दावा, सत्यापन बाकी

दावे के मुताबिक, कमर्शियल प्रॉपर्टी से होने वाली आय मेंटेनेंस और संचालन लागत निकालने के बाद बची राशि को फ्लैट मालिकों में बांट दिया जाता है। यह वीडियो तब और ज्यादा चर्चा में आया जब Paytm के संस्थापक विजय शेखर शर्मा ने भी इसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर साझा किया और आश्चर्य जताया। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। इसके बावजूद, मुंबई जैसे महंगे शहर में “रहने के लिए पैसा मिलने” की अवधारणा ने लोगों की जिज्ञासा और बहस को जरूर तेज कर दिया है।

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