VIDEO: प्रेगनेंट महिला की मौत के बाद कैसे होता है पोस्टमॉर्टम? गर्भ से ऐसे निकाला जाता है मृत शिशु, सामने आया दिल दहला देने वाला सच

Edited By Updated: 21 Oct, 2025 09:42 AM

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मां बनने की खुशी हर महिला के जीवन का सबसे खूबसूरत सपना होती है। लेकिन सोचिए, अगर उस सपने के साथ ही मौत दस्तक दे दे, तो? सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो ने इसी दिल दहला देने वाले सवाल को सबके सामने ला खड़ा किया है। वीडियो किसी आम यूजर का नहीं,...

नेशनल डेस्क:  मां बनने की खुशी हर महिला के जीवन का सबसे खूबसूरत सपना होती है। लेकिन सोचिए, अगर उस सपने के साथ ही मौत दस्तक दे दे, तो? सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो ने इसी दिल दहला देने वाले सवाल को सबके सामने ला खड़ा किया है। वीडियो किसी आम यूजर का नहीं, बल्कि एक फॉरेंसिक एक्सपर्ट का है, जिसने गर्भवती महिला की मौत के बाद की पोस्टमॉर्टम प्रक्रिया को विस्तार से बताया—ऐसे तथ्य जो शायद पहले आम लोग जानते ही नहीं थे।

जब दो जिंदगियां साथ बुझ जाती हैं
वीडियो में बताया गया कि अगर किसी गर्भवती महिला की मौत हो जाती है और बच्चा पेट में जिंदा रहने की संभावना हो, तो डॉक्टर आपातकालीन सर्जरी (सी-सेक्शन) के जरिए उसे बचाने की कोशिश करते हैं। लेकिन अगर मां और बच्चा दोनों की मृत्यु हो चुकी हो, तब पोस्टमॉर्टम के दौरान एक बेहद संवेदनशील और वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाई जाती है।

विशेषज्ञ के अनुसार, ऑटोप्सी के समय गर्भस्थ शिशु को बेहद सावधानी से बाहर निकाला जाता है। उसके बाद, कानून और फॉरेंसिक नियमों के अनुसार, बच्चे के रक्त या ऊतक से डीएनए नमूना लिया जाता है।

DNA कार्ड: पहचान की उम्मीद
ये डीएनए सैंपल भविष्य में पितृत्व की पुष्टि के लिए काम आते हैं, खासकर उन मामलों में जहां महिला की पहचान संदिग्ध हो या कानूनी विवाद हो। फॉरेंसिक विज्ञान में इसे एक महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है, क्योंकि यह न सिर्फ जैविक संबंध की पुष्टि करता है, बल्कि आपराधिक मामलों में भी गवाह बन सकता है। एक्सपर्ट बताते हैं कि बच्चे के नमूने को सुरक्षित रखकर एक 'डीएनए कार्ड' बनाया जाता है, जो भविष्य में पहचान और न्याय के लिए अहम दस्तावेज बनता है।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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मां और बच्चे की आखिरी विदाई एक साथ
सबसे भावनात्मक हिस्सा वो होता है, जब पोस्टमॉर्टम के बाद मां और बच्चे को एक साथ अंतिम विदाई दी जाती है। फॉरेंसिक नियमों के तहत बच्चे को साफ कपड़ों में लपेटकर मां की गोद या हाथों में रखा जाता है। फिर दोनों को एक ही बॉडी बैग में रखकर दफनाया या दाह किया जाता है। यह प्रक्रिया ना केवल वैज्ञानिक रूप से सटीक होती है, बल्कि मृतकों के परिवार को भावनात्मक रूप से भी सुकून देती है—जैसे मां और बच्चा आखिरी बार साथ हैं।

सोशल मीडिया पर भावनाओं का सैलाब
वीडियो सामने आने के बाद लाखों लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी। कुछ ने इसे ‘दिल तोड़ देने वाला’ बताया, तो कई लोग इस प्रक्रिया से पहले अनजान थे। लोगों को यह जानकर हैरानी हुई कि मौत के बाद भी फॉरेंसिक साइंस इस तरह संवेदनशीलता और तकनीक का संतुलन बनाए रखती है।

धार्मिक और सांस्कृतिक नजरिए से भी खास
भारत में खासकर हिंदू धर्म में गर्भवती महिला के अंतिम संस्कार को लेकर कई मान्यताएं हैं। परंपरा के अनुसार, गर्भ में बच्चा होने की स्थिति में सामान्य दाह-संस्कार नहीं किया जाता। कई बार बच्चे को पहले अलग किया जाता है, जिससे उसकी आत्मा को अलग से मुक्ति मिल सके। हालांकि आधुनिक फॉरेंसिक गाइडलाइंस इन पारंपरिक मान्यताओं के साथ वैज्ञानिक पद्धति को जोड़ने की कोशिश करती हैं।

एक सच्चाई जो आंखें खोल देती है
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान होने वाली मौतों की जांच के लिए विशेष ऑटोप्सी नियम बनाए गए हैं। भारत में हर साल करीब 27,000 गर्भवती महिलाएं दम तोड़ देती हैं, जिनमें से हजारों मामलों में भ्रूण भी जीवन गंवा बैठते हैं। इन मामलों में पोस्टमॉर्टम के दौरान इस वैज्ञानिक लेकिन भावनात्मक प्रक्रिया का पालन किया जाता है।

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