ट्रंप के एक्शन से भारत को बड़ा फायदा, वेनेजुएला से 1 अरब डॉलर की बकाया रकम मिलने की उम्मीद

Edited By Updated: 04 Jan, 2026 11:10 PM

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अमेरिका के हालिया सैन्य अभियान के बाद अब संकेत मिल रहे हैं कि वेनेजुएला पर लगे कड़े प्रतिबंधों में ढील दी जा सकती है।

नेशनल डेस्कः अमेरिका के हालिया सैन्य अभियान के बाद अब संकेत मिल रहे हैं कि वेनेजुएला पर लगे कड़े प्रतिबंधों में ढील दी जा सकती है। जानकारों का मानना है कि इससे भारत को करीब 1 अरब डॉलर (लगभग 8,000 करोड़ रुपये) का सीधा फायदा हो सकता है।विश्लेषकों के अनुसार, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही यह संकेत दे चुके हैं कि अमेरिकी तेल कंपनियां वेनेजुएला में दोबारा प्रवेश कर सकती हैं, ताकि खराब हो चुके तेल ढांचे की मरम्मत हो और कच्चे तेल का उत्पादन फिर से शुरू किया जा सके।

प्रतिबंध हटते ही शुरू हो सकता है व्यापार

केप्लर (Kpler) के विश्लेषक निखिल दुबे के मुताबिक, जैसे ही प्रतिबंधों में ढील मिलेगी, वेनेजुएला के साथ तेल व्यापार दोबारा शुरू हो सकता है। उन्होंने बताया कि भारतीय रिफाइनरियां तकनीकी रूप से वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल को प्रोसेस करने में पूरी तरह सक्षम हैं। अगर अमेरिका की अगुवाई में वेनेजुएला के तेल क्षेत्र का अधिग्रहण या पुनर्गठन होता है, तो इससे भारत को आर्थिक और रणनीतिक दोनों तरह का बड़ा फायदा मिल सकता है।

भारत को मिलेगा बकाया भुगतान

इस बदलाव से भारत को वेनेजुएला से करीब 1 अरब डॉलर के लंबित भुगतान की वसूली का रास्ता खुल सकता है। इसके साथ ही, भारतीय कंपनियों द्वारा संचालित तेल क्षेत्रों में उत्पादन फिर से शुरू होने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और विदेशों में तेल निवेश को नया जीवन मिलेगा।

कभी भारत था वेनेजुएला का सबसे बड़ा खरीदार

प्रतिबंध लगने से पहले, भारत वेनेजुएला के तेल का सबसे बड़ा खरीदार हुआ करता था। भारत रोजाना 4 लाख बैरल से ज्यादा कच्चा तेल वेनेजुएला से आयात करता था। वेनेजुएला सालाना करीब 707 मिलियन बैरल कच्चा तेल निर्यात करता था इसमें भारत और चीन की हिस्सेदारी करीब 35% थी। वेनेजुएला का तेल भारी (Heavy Crude) होता है, जो भारत की कई रिफाइनरियों के लिए उपयुक्त माना जाता है।

2020 में अमेरिकी प्रतिबंधों से रुका कारोबार

2020 में अमेरिका द्वारा लगाए गए सख्त प्रतिबंधों के बाद भारत को वेनेजुएला से तेल आयात पूरी तरह बंद करना पड़ा। इससे भारतीय रिफाइनर कंपनियों को वहां से बाहर निकलना पड़ा और भारत की प्रमुख विदेशी तेल कंपनी ONGC विदेश लिमिटेड (OVL) को बड़ा नुकसान हुआ। OVL, पूर्वी वेनेजुएला के सैन क्रिस्टोबल तेल क्षेत्र का संयुक्त संचालन करती थी। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण जरूरी उपकरण, आधुनिक तकनीक और ऑयल फील्ड सेवाएं नहीं मिल पाईं। नतीजतन, तेल उत्पादन तेजी से गिर गया और बड़े भंडार होने के बावजूद यह क्षेत्र व्यावसायिक रूप से लगभग बंद हो गया।

OVL का वेनेजुएला पर 1 अरब डॉलर से ज्यादा बकाया

उद्योग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, वेनेजुएला ने 2014 तक OVL की 40% हिस्सेदारी के 536 मिलियन डॉलर का भुगतान नहीं किया। इसके बाद के वर्षों का भुगतान भी ऑडिट की अनुमति न मिलने और प्रतिबंधों के कारण अटका रहा। कुल मिलाकर, OVL का बकाया करीब 1 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है।

वेनेजुएला में भारतीय कंपनियों की मजबूत मौजूदगी

भारतीय कंपनियों की वेनेजुएला के तेल क्षेत्रों में अच्छी हिस्सेदारी है:

  • OVL → काराबोबो-1 भारी तेल ब्लॉक में 11% हिस्सेदारी

  • IOC और ऑयल इंडिया → 3.5% हिस्सेदारी

विश्लेषकों का कहना है कि अगर अमेरिका की निगरानी में वेनेजुएला की सरकारी तेल कंपनी PDVSA का पुनर्गठन होता है, तो इन परियोजनाओं को नई रफ्तार और निवेश मिल सकता है।

एक साल में तेजी से बढ़ सकता है उत्पादन

पीटीआई के अनुसार, प्रतिबंध हटते ही OVL गुजरात में ONGC के तेल क्षेत्रों से ड्रिलिंग रिग और जरूरी उपकरण तेजी से सैन क्रिस्टोबल भेज सकता है। फिलहाल वहां तेल उत्पादन घटकर 5,000 से 10,000 बैरल प्रतिदिन रह गया है। लेकिन नए कुएं और आधुनिक तकनीक से यह उत्पादन 80,000 से 1 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि एक साल के भीतर उत्पादन में बड़ा इजाफा संभव है।

भारत के लिए रणनीतिक फायदा

अगर यह योजना सफल होती है, तो भारत को मध्य पूर्व के तेल पर निर्भरता कम करने और वैश्विक ऊर्जा बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करने का बड़ा मौका मिलेगा।

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