Edited By Parveen Kumar,Updated: 24 Mar, 2026 06:23 PM

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की ‘अंत्योदय’ विचारधारा यह कहती है कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का उत्थान ही वास्तविक विकास का मापदंड है। जब तक अंतिम व्यक्ति का जीवन स्तर नहीं उठेगा, तब तक विकास अधूरा ही रहेगा। वस्तुतः किसी भी राज्य के विकास का...
नेशनल डेस्क : पंडित दीनदयाल उपाध्याय की ‘अंत्योदय’ विचारधारा यह कहती है कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का उत्थान ही वास्तविक विकास का मापदंड है। जब तक अंतिम व्यक्ति का जीवन स्तर नहीं उठेगा, तब तक विकास अधूरा ही रहेगा। वस्तुतः किसी भी राज्य के विकास का वास्तविक पैमाना उसकी ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें या बढ़ती जीडीपी नहीं, बल्कि वहां के सबसे कमजोर वर्ग का सुरक्षित, सम्मानजनक और आत्मनिर्भर जीवन है।
यह वंचितों के सशक्तीकरण और विकास की मूल भावना है उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने पिछले नौ वर्षों में इसी मूल मंत्र को अपनाया है। उत्तर प्रदेश में वंचितों का सशक्तीकरण और उन्हें मजबूत सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना केवल एक नीति नहीं, बल्कि एक नैतिक और संवैधानिक दायित्व है। वृद्धजन, निराश्रित महिलाएं, दिव्यांगजन या आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, इन सभी के लिए सुरक्षा कवच तैयार करना और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने को योगी सरकार ने अपना मानवीय धर्म माना और उनके लिए न सिर्फ सहायता सुनिश्चित की गई बल्कि ऐसे अवसर भी पैदा किए गए कि वे अपनी क्षमता पहचान सकें।
भारतीय संविधान ने समता, स्वतंत्रता और न्याय को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि नीति-निर्देशक सिद्धांतों के रूप में राज्य के दायित्व में बांधा है। फिर भी आज़ादी के सात दशकों बाद भी करोड़ों लोग जाति-जनजाति, महिलाएं, अल्पसंख्यक, प्रवासी मज़दूर, दिव्यांगजन मुख्यधारा के विकास से कटे हुए थे। यह सामाजिक बहिष्करण न केवल मानवीय गरिमा का अपमान था, बल्कि राष्ट्र की उत्पादन-क्षमता और सामाजिक स्थिरता को भी आघात पहुंचा रहा था। इसलिए 2017 में सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सामाजिक सुरक्षा को मानवीय संवेदना और समावेशी विकास के मूल मंत्र के रूप में स्थापित करने का प्रयास शुरू किया जो आज करोड़ों लोगों के जीवन परिवर्तन की कहानी बन गया है।
सामाजिक सुरक्षा योजनाएं उस आधारशिला की तरह होती हैं, जिस पर समावेशी विकास की पूरी इमारत खड़ी होती है। ये योजनाएं न केवल आर्थिक सहायता देती हैं, बल्कि व्यक्ति को यह विश्वास भी देती हैं कि वह अकेला नहीं है, राज्य उसके साथ खड़ा है। प्रदेश सरकार ने सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के माध्यम से जिस व्यापक जनसमूह को राहत पहुंचाई है, वह अपने आप में अभूतपूर्व है। आज 67.50 लाख वृद्धजन, 26.81 लाख निराश्रित महिलाएं और 11.57 लाख दिव्यांगजन नियमित पेंशन का लाभ प्राप्त कर रहे हैं। यह केवल एक आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए जीवन की एक स्थिरता है, जिनके लिए हर दिन एक संघर्ष रहा है।
वर्ष 2017 में जहां मात्र 300 रुपये प्रतिमाह की पेंशन थी, उसे बढ़ाकर 1000 रुपये किया गया और अब अप्रैल 2026 से इसे 1500 रुपये मासिक करने का निर्णय लिया गया है। यह वृद्धि केवल राशि में बढ़ोतरी नहीं है, बल्कि यह उस संवेदनशीलता का प्रमाण है, जो आमजन को शासन के केंद्र में रखती है। कुष्ठावस्था पेंशन में वृद्धि भी इसी दृष्टिकोण का हिस्सा है। इसे 2500 रुपये से बढ़ाकर 3000 रुपये प्रतिमाह किया गया है, जिससे 12,807 लाभार्थियों को राहत मिली है। यह निर्णय उन वर्गों के प्रति सरकार की संवेदनशीलता को दर्शाता है, जो अक्सर समाज की मुख्यधारा से अलग-थलग रह जाते हैं। सामाजिक सुरक्षा का असली अर्थ ही यही है कि कोई भी व्यक्ति उपेक्षित न रहे।
उत्तर प्रदेश की यह कम बड़ी उपलब्धि नहीं है कि पिछले नौ वर्षों में छह करोड़ से अधिक लोग गरीबी रेखा से ऊपर आए हैं। यह आंकड़ा केवल आर्थिक उन्नति का संकेत नहीं देता, बल्कि यह बताता है कि योजनाओं का क्रियान्वयन जमीन पर किस हद तक प्रभावी रहा है। गरीबी से बाहर निकलना केवल आय बढ़ने का मामला नहीं होता, बल्कि यह जीवन स्तर, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सम्मान से भी जुड़ा होता है। गरीबों के लिए आवास और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना किसी भी कल्याणकारी राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है। पिछले नौ वर्षों में 62 लाख से अधिक लोगों को मुफ्त आवास उपलब्ध कराए गए हैं। अपना घर होने का अर्थ है- भविष्य की चिंता से मुक्ति और जीवन को बेहतर बनाने का अवसर।
कोरोना संक्रमण काल में सभी ने देखा की राज्य ने किस तरह यह सुनिश्चित किया कि कोई परिवार भूखा न रहे। यह व्यवस्था अब तक बनी हुई है। 15 करोड़ गरीबों को प्रति माह 35 किलोग्राम खाद्यान्न के साथ एक किलोग्राम दाल या साबुत चना, एक किलोग्राम आयोडाइज्ड नमक और एक किलोग्राम रिफाइंड तेल का नि:शुल्क वितरण वंचितों की सामाजिक सुरक्षा का सबसे बड़ा उदाहरण है। इसके अलावा प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत 1.86 करोड़ से अधिक परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन, होली और दीपावली जैसे त्योहारों पर दो मुफ्त एलपीजी सिलेंडर का वितरण सामाजिक संवेदनशीलता का दृष्टिकोण है। महिलाओं और बच्चों के सशक्तिकरण के बिना किसी भी समाज का समग्र विकास संभव नहीं है।
मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना के तहत 26.81 लाख बेटियां लाभान्वित हुई हैं। इस योजना ने समाज और परिवारों में बेटियों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित किया है। मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना एक लाख से अधिक उन बच्चों के लिए संजीवनी साबित हुई, जिन्होंने किसी कारणवश अपने अभिभावकों को खो दिया। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के माध्यम से 60 लाख माताओं को लाभ मिला है, जिससे मातृत्व के दौरान उन्हें आर्थिक सहारा मिला और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं सुनिश्चित हो सकीं। मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना के अंतर्गत 5.20 लाख से अधिक बेटियों के विवाह संपन्न कराना योगी का वह अभिभावक रूप है जो हर किसी के सामाजिक दायित्वों की रक्षा करता है।
महिला सशक्तीकरण की बात करें तो आंकड़े सकारात्मक तस्वीर सामने लाते हैं। 9.43 लाख स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से 1.06 करोड़ से अधिक महिलाओं को जोड़कर आत्मनिर्भर बनाना, 18.55 लाख महिलाओं का लखपति श्रेणी में पहुंचना, स्वयं सहायता समूहों को 2,682 उचित मूल्य की दुकानों का आवंटन महिलाओं की भागीदारी को एक नई दिशा देता है। यह केवल रोजगार का अवसर नहीं, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी है। कई राज्यों के लिए यह आंकड़ा एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है कि 2017 में जहां महिला श्रम बल भागीदारी लगभग 13 प्रतिशत थी, वह बढ़कर करीब 36 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह वृद्धि न केवल आर्थिक विकास को गति देती है, बल्कि समाज में लैंगिक समानता को भी मजबूत करती है।
उत्तर प्रदेश में सामाजिक सुरक्षा केवल एक नीति नहीं, बल्कि एक व्यापक आंदोलन के रूप में उभरी है। यह आंदोलन उन लोगों के जीवन को बदल रहा है, जो कभी विकास की धारा से दूर थे। यह सुनिश्चित कर रहा है कि विकास का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचे—चाहे वह वृद्ध हो, महिला हो, दिव्यांग हो या गरीब। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का यह व्यापक विस्तार सरकार और नागरिकों के बीच विश्वास का रिश्ता मजबूत करता है। संवेदनशील शासन, सशक्त समाज और समावेशी विकास मिलकर एक नई कहानी लिख रहे हैं। नीतियां तभी सफल होती हैं जब वे कागज से उठकर जिंदगियों में उतर जाती हैं। हालांकि कई चुनौतियां अभी भी हैं, जरूरतें अभी भी हैं। लेकिन जब दिशा सही हो तो उम्मीदों के कैनवस में धीरे-धीरे रंग भरता ही जाता है। -कमलेश तिवारी, समाजशास्त्री