देश की आर्थिक समृद्धि का आधार है गाय

Edited By Updated: 02 Mar, 2016 01:38 AM

basis of the country s economic prosperity cow

यह सच है कि स्वतंत्रता के बाद हमारी नैतिकता का ह्रास हुआ है। स्वार्थपरता बढ़ी है। नारों और वह भी फोके नारों से देश की जनता को ठगा गया है।

(मा. मोहन लाल): यह सच है कि स्वतंत्रता के बाद हमारी नैतिकता का ह्रास हुआ है। स्वार्थपरता बढ़ी है। नारों और वह भी फोके नारों से देश की जनता को ठगा गया है। गौरक्षा पर आंदोलन चले, गौमाता की जय-जयकार की गई, परन्तु रास्तों, सड़कों, शहर के कूड़े के ढेरों पर अशक्त, अपंग, बूढ़ी और दूध न देने वाली गायों को खुला छोड़ दिया गया है। 

 
आवारा सांडों की तो शहरों में भरमार हो गई। आवारा सांड आपस में सींग भिड़ाते और मानवीय जिंदगियों को रौंदते जाते हैं। अधिक हुआ तो ऐसे सांडों को महाराष्ट्र के देवनार बूचडख़ाने के हवाले कर दिया। कृषक की खेती की ऊर्जा बैल बेकार हो गया। 1955-56 में जब हम खेती करते थे तो गाय के बछड़े को ‘फलहों’ पर जोत कर ‘हाली’ किया जाता था। उसे सरसों का तेल पिलाते, आटे के पेड़े में मक्खन डालकर खिलाते।
 
मशीनें क्या आईं खेती में बैल बेकार हो गया। गौवंश के मांस का धड़ाधड़ निर्यात होने लगा। स्मरण रहे कि 1947 में हमारे देश में 123 करोड़ पशु धन था और आज सिर्फ 10 करोड़। 500 सालों के मुसलमान शासन और 150 साल के अंग्रेजी शासन में जितनी गौहत्या हुई उससे कई गुणा हमारी आजाद सरकार के शासन के दौरान गौ हत्याएं हो गईं।
 
1973 में 2000 टन गौमांस का निर्यात था तो 1975 में 61,000 टन हो गया। 1985 में 89,000 टन तो 1990 में 1,30,000 टन हो गया। 1995 में 1,35,000 टन तो सन् 2000 में 2 लाख टन मांस का निर्यात किया गया। 2016 आते-आते मांस का निर्यात 5 लाख टन हो गया। नित्य नए बूचडख़ाने खुलने लगे।
 
ये बूचडख़़ाने मुसलमान चलाते हैं? नहीं। इनके लिए गौवंश हिंदू भेजते हैं। दुनिया का सबसे बड़ा बूचडख़ाना महाराष्ट्र के देवनार में है जहां नित्य प्रति 400 से 600 गौवंश की हत्या की जाती है। यह भी सच है कि देश में भार वाहन, प्रजनन, खेती योग्य और दूध देने वाले पशुओं का वध निषेध है। 
 
इसके अतिरिक्त ओडिशा, केरल, पश्चिम बंगाल, अरुणाचल प्रदेश, असम, गोवा, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा में धड़ल्ले से बूचडख़ाने चल रहे हैं। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली,  गुजरात, उत्तरप्रदेश और पंजाब में गौ-हत्या बंद है, पर चोरी-छिपे गौ हत्याएं जारी हैं। अगर यही क्रम रहा तो गौहत्याओं से देश की आर्थिक समृद्धि रुक जाएगी।
 
कीटनाशक दवाओं का इसी तरह प्रयोग करते गए तो हमारी धरती का स्वास्थ्य जर्जर हो जाएगा। कैंसर, शूगर, आमाशय और गले की बीमारियों से देश की जनता ऊंघने लगेगी। यह भी ध्यान रखे सरकार कि भौतिक प्रगति की अंधी दौड़ में हमारे राष्ट्र का प्राणाधार गौवंश की उपेक्षा एक सुनियोजित षड्यंत्र है। हमें पुन: ग्रामीण संस्कृति की ओर लौटना होगा। हमें गांवों के बेकार नौजवानों को गौवंश के संरक्षण, पोषण और पालन का काम सौंपना चाहिए। स्वदेशी गाय के दूध को प्रोत्साहन देने के लिए गांवों में डेयरियां नौजवानों को खोल कर देनी चाहिएं। बेकार नौजवानों को सरकार धड़ाधड़ कर्ज दे। ‘गाय लाओ देश बचाओ’ का संकल्प लेना होगा।
 
दूध पीने वालों को सोचना होगा कि वह कौन-सा दूध पी रहे हैं और कैसे हाथों से पी रहे हैं? विदेशी गायों या भैंसों के दूध से अजीब-सी सड़ांध आ रही होती है और हम वह दूध गटागट पीते जा रहे हैं। इससे हर दूध पीने वाला शूगर का रोगी हो रहा है। स्वदेशी गाय साहीवाल, राठी या केरल की देसी गाय पालने का अभियान देश में चलना चाहिए।
 
कमाल है यूरोपियन देश हमारी साहीवाल गाय की नस्ल को बढ़ावा दे रहे हैं, अपने दूध का निर्यात कर रहे हैं और हम हैं कि अपनी ही देसी गाय की नस्ल विकृत कर रहे हैं। अपनी ही देसी गाय को मरियल बना रहे हैं। विदेशी गाय का बछड़ा हमारी खेती के योग्य नहीं। उससे तो उठा भी नहीं जाता। अपने देसी बैल तैयार करो और मशीनों का प्रचलन जहां तक हो सके कम करो।  अपने गौवंश के गोबर-मूत्र से देसी खाद तैयार करो। धरती में फिर जीवन डालो। उर्वरकों, कीटनाशक दवाओं या यूरिया खाद के बार-बार प्रयोग से धरती को मारो मत। लौट चलो देसी खादों, देसी गऊओं की ओर। 
 
सुना है 2015-16 के बजट में केंद्र सरकार ने गौवंश के संवद्र्धन के लिए 500 करोड़ रुपए का प्रावधान रखा है। यह तो ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। कम से कम 2500 करोड़ की व्यवस्था केंद्र के बजट में रखी जाए। उसमें भी 500 करोड़ रुपए सिर्फ देसी गौवंश की समृद्धि के लिए चिन्हित किए जाएं। क्यों?
 
इसलिए कि भारतीय संस्कृति का आधार गौ-माता है। गाय हमारी श्रद्धा का केंद्र है। गाय सर्वश्रेष्ठ, पवित्र व पूजनीय मानी गई है। इसके घी, दूध, दही, गोबर के बिना संसार का कोई यज्ञ सम्पूर्ण नहीं होता। जहां गऊ है वहां पाप नहीं होगा। प्राचीन भारत में जिसके पास अधिक गऊएं होती थीं वही सबसे अमीर कहलाता था। यज्ञ में गाय के घी की आहुति दी जाती थी जिससे सूर्य की किरणें पुष्ट होती थीं। सूर्य की किरणें पुष्ट होंगी तो वर्षा होगी। वर्षा होगी तो अन्न होगा। अन्न ही जीवन है। वर्षा होगी तो वनस्पति होगी।
 
हमारे जीवन में गाय, गंगा, गायत्री, गीता और गुरु का विशेष महत्व है। सुनो तो सही मेरी बात—गाय हमारे धर्म और मोक्ष का आधार है, गाय हमारे स्वास्थ्य का आधार है, गाय हमारी आर्थिक समृद्धि की सूचक है। यदि भारत अपनी धरती को प्राणमयी बनाना चाहता है तो रासायनिक खादों से परहेज करे। 
 
यदि भारत महात्मा गांधी की ग्रामीण संस्कृति को जिंदा रखना चाहता है तो स्वदेशी गायों को पालने के लिए बेकार नौजवानों को सरकार सस्ती दरों पर ऋण प्रदान करे। गौवंश के गोबर-मूत्र की देसी खाद तैयार करे। गाय के गोबर और मूत्र से बायोगैस का उत्पादन कर ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करे। 
 
विदेशी नस्ल की गाय दूध ही अधिक देती है न? परन्तु उस दूध में फैट्स और प्रोटीन की मात्रा अधिक होने से शूगर की बीमारी होगी और कोलैस्ट्रॉल मनुष्य के शरीर में बढ़ जाएगा। स्वदेशी गाय का दूध पौष्टिक तो है ही साथ ही निरोगी भी है। विदेशी बैल, विदेशी गाय विदेशों को वापस कर दो। भारत स्वदेशी गाय की नस्ल के संवद्र्धन, पालन-पोषण को उत्साहित करने के लिए अपने बजट का मुंह खोले। गौशालाओं की आर्थिक सहायता करे तब गौमाता की जय होगी। तब देश की धरती स्वस्थ होगी।
 

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