Edited By ,Updated: 11 May, 2026 05:25 AM

भारत के प्राइवेट और सरकारी स्कूलों में शिक्षा की स्थिति और बच्चों के ज्ञान के स्तर के संबंध में हाल ही में जारी हुई नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार देश के लगभग 8000 स्कूलों में एक भी छात्र नहीं है। इनमें 3812 स्कूलों के साथ पश्चिम बंगाल शीर्ष पर और...
भारत के प्राइवेट और सरकारी स्कूलों में शिक्षा की स्थिति और बच्चों के ज्ञान के स्तर के संबंध में हाल ही में जारी हुई नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार देश के लगभग 8000 स्कूलों में एक भी छात्र नहीं है। इनमें 3812 स्कूलों के साथ पश्चिम बंगाल शीर्ष पर और 2245 स्कूलों के साथ तेलंगाना दूसरे स्थान पर है। पंजाब और जम्मू-कश्मीर में ऐसे स्कूलों की संख्या क्रमश: 13 और 146 है। रिपोर्ट के अनुसार भले ही कागजों में ये स्कूल चालू दिखाए गए हैं परन्तु व्यावहारिक रूप में इन स्कूलों में कोई छात्र नहीं है और ये किसी उद्देश्य की पूर्ति नहीं करते। चूंकि इन स्कूलों के रिकार्ड को मेंटेन नहीं किया गया है, इसलिए इन्हें सरकार से वित्तीय सहायता भी लगातार मिल रही है।
इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि विशेष रूप से ग्रामीण और कबाइली क्षेत्रों में स्थित स्कूलों में अध्यापकों की भी भारी कमी है। देश में 1 लाख के लगभग स्कूल केवल एक अध्यापक के सहारे चल रहे हैं तथा पिछले दो दशकों में सरकारी स्कूलों में दाखिले में 22 प्रतिशत की गिरावट आई है जो 2005 के 71 प्रतिशत से घटकर 2024-25 में 49.24 प्रतिशत हो गया। अपने बच्चों के बेहतर भविष्य की चिंता में माता-पिता सरकारी स्कूलों की बजाय प्राइवेट स्कूलों को अधिमान दे रहे हैं। भारत की स्कूली शिक्षा प्रणाली पर नीति आयोग की रिपोर्ट में बताया गया है कि अब सभी माध्यमिक संस्थानों में प्राइवेट स्कूलों की हिस्सेदारी 44.01 प्रतिशत हो गई है जो निजी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने की अभिभावकों में बढ़ रही प्रवृत्ति का सूचक है। रिपोर्ट के अनुसार यह बदलाव आने का कारण यह है बच्चों के अभिभावकों के मन में यह बात बैठ गई है कि प्राइवेट स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम की बेहतर शिक्षा, कड़ा अनुशासन और भविष्य में रोजगार प्राप्त करने के अच्छे अवसर मिलते हैं।
नीति आयोग ने कहा कि भारत की स्कूली शिक्षा प्रणाली में, खासतौर पर माध्यमिक स्तर पर निजी संस्थानों की ओर एक उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला है। यह बदलाव बेहतर परिणामों के लिए अभिभावकों की आकांक्षाओं को दर्शाता है लेकिन शिक्षा में प्राइवेट सैक्टर की इस तेज बढ़ौतरी ने गुणवत्ता समानता और नियमन को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं। रिपोर्ट के अनुसार हालत यह है कि कम फीस वाले प्राइवेट (एल.एफ.पी.) स्कूलों की स्थिति चिंताजनक है। यहां कक्षा पांचवीं के 35 प्रतिशत छात्र कक्षा दो की किताब भी पढ़ नहीं पाते जबकि 60 प्रतिशत छात्र गुणा-भाग के बुनियादी सवाल हल नहीं कर पाते। रिपोर्ट के अनुसार कई एल.एफ.पी. स्कूल शिक्षा के अधिकार (आर.टी.ई) अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित मापदंडों को पूरा नहीं करते। वहां शौचालय, खेल के मैदान और स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। ऐसे स्कूलों में शिक्षकों को कम वेतन पर तथा नौकरी की सुरक्षा के बगैर काम करना पड़ता है जिसका सीधा असर पढ़ाई की गुणवत्ता पर पड़ता है।
रिपोर्ट ने देश के शिक्षण कार्यबल में व्यापक चुनौतियों को भी उजागर किया। देशभर में लगभग 14 लाख स्कूलों में करीब 1.01 करोड़ शिक्षक कार्यरत हैं। छात्र-शिक्षक अनुपात में सुधार के बावजूद कई ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में शिक्षकों की कमी है। देश में एक लाख से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं जो केवल एक-एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। स्कूलों के बुनियादी ढांचे में सुधार के बावजूद अभी भी 98592 स्कूलों में लड़कियों के शौचालय चालू हालत में नहीं हैं जिससे स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा होता है। भारत में लगभग 14.71 लाख स्कूलों में से लगभग 50 प्रतिशत स्कूल सिर्फ प्राइमरी तक कक्षाओं के लिए हैं जबकि सिर्फ 5.4 प्रतिशत स्कूल कक्षा 1 से 12वीं कक्षा तक शिक्षा प्रदान करते हैं। एक अन्य रिपोर्ट बताया गया है कि इन दिनों राजस्थान के बाड़मेर में शहर से 12 कि.मी. दूर आदर्श चूली की राऊ प्रा.वि. केसर सिंह की ढाणी में 8वीं तक की क्लास 45 डिग्री गर्मी और लू के बीच रोज एक पेड़ की छांव में लग रही है।
स्कूल में 27 बच्चे नामांकित हैं और 4 महिला टीचर रोज पढ़ाने आती हैं। स्कूल के लिए जमीन भी है और भवन के लिए 34 लाख 73 हजार 539 रुपए का बजट भी स्वीकृत हो चुका है फिर भी इमारत नहीं बनी। स्कूल की घंटी नहीं बजती क्योंकि सभी क्लासें एक ही पेड़ के नीचे लगती हैं। बच्चे रोज पास के गोरधन सिंह के घर से बोर्ड, टेबल कुर्सी और दरी उठाकर लाते हैं। पानी भी बच्चे घर से बोतल में लेकर पहुंचते हैं। ऐसे में देश में शिक्षा सुधरे तो कैसे और नारी सशक्तिकरण हो तो कैसे!