महिला आरक्षण में पिछड़ा कोटा अब बनेगा चुनावी मुद्दा

Edited By Updated: 22 Sep, 2023 05:06 AM

backward quota in women reservation will now become an election issue

महिलाओं के लिए आरक्षण क्या  पिछड़ों वर्ग के क्षत्रपों का राजनीति पर दबदबा खत्म करने का एक बड़ा दांव साबित हो सकता है। पिछड़े वर्ग के कई नेता लगातार कहते रहे हैं कि पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए अलग कोटा नहीं होने पर एक बार फिर से लोकसभा और...

महिलाओं के लिए आरक्षण क्या  पिछड़ों वर्ग के क्षत्रपों का राजनीति पर दबदबा खत्म करने का एक बड़ा दांव साबित हो सकता है। पिछड़े वर्ग के कई नेता लगातार कहते रहे हैं कि पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए अलग कोटा नहीं होने पर एक बार फिर से लोकसभा और विधानसभाओं में सवर्ण जातियों का दबदबा बढ़ जाएगा। शिक्षा और सामाजिक पिछड़ेपन के कारण पिछड़ी जातियों की बहुत कम महिलाएं राजनीति में सक्रिय हैं। 1993 में पंचायत,जिला परिषद और नगर निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण का कानून बनाए जाने के बाद भी पिछड़ा वर्ग से ज्यादा संख्या में महिलाएं राजनीति में दबदबा कायम नहीं कर पाईं। आमतौर पर राजनीति में असर रखने वाले परिवार की महिलाएं ही आरक्षित सीटों से जीतती हैं। 

स्थानीय स्तर पर उनके पति या परिवार के पुरुष सदस्य उनके नाम पर काम करते हैं। इन महिलाओं के लिए विधानसभा या लोकसभा का चुनाव जीतना आसान नहीं होगा जबकि सवर्ण महिलाएं आसानी से जीत सकती हैं। राजनीतिक हार से बचने के लिए जाति आधारित पार्टियों ने भी बिल को समर्थन देकर लोकसभा में पास कर दिया लेकिन उनकी राजनीतिक शक्ति घटने की आशंका अब भी बनी हुई है। 

किसका होगा फायदा : गृह मंत्री अमित शाह ने बिल पर बहस के दौरान बताया कि भाजपा के 85 सांसद यानी 29 प्रतिशत पिछड़े वर्ग से हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के 303 सदस्य जीते थे। विधान सभाओं में 27 फीसदी और विधान परिषदों में 40 प्रतिशत पिछड़े वर्ग से हैं। मोदी सरकार में 29 मंत्री पिछड़े वर्ग से हैं। माना जाता है कि देश में पिछड़ों की आबादी 60 प्रतिशत है। इस हिसाब से पिछड़ों का प्रतिनिधित्व कम है। इसके बावजूद पिछड़े वर्ग का कोटा तय किए बिना इसे पास करा लेना मोदी सरकार की एक बड़ी जीत मानी जा सकती है। महिला आरक्षण बिल को संसद में कई बार पेश किया गया। हर बार पिछड़ों के कोटा के मुद्दे पर उसे पास नहीं किया जा सका। 

1996, 2002, 2003 और 2008 में इस पर कोई सहमति नहीं बन पाई। 2010 में महिला आरक्षण बिल राज्यसभा से पास हो गया लेकिन लोकसभा में पिछड़े नेताओं के विरोध के कारण इसे पास नहीं किया जा सका। एक दिलचस्प बात यह है कि सवर्ण जिस पार्टी के साथ होते हैं वह पार्टी पिछड़े कोटा के बिना ही बिल पास कराना चाहती है। 2010 में सवर्ण कांग्रेस के साथ थे इसलिए कांग्रेस पिछड़े कोटा से बचती रही। अब सवर्णों का बड़ा वर्ग भाजपा के साथ है इसलिए भाजपा भी बिना पिछड़ा कोटा के बिल ले आई और पास भी करा लिया। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जैसे नेताओं को भी मजबूरी में समर्थन देना पड़ा। लेकिन इस बार उनको एक बड़ी सफलता कांग्रेस के समर्थन के रूप में मिली। कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी ने भी बिल पर बहस के दौरान पिछड़ों के कोटा का समर्थन किया। 

कोटा की मांग अब खत्म होगी  : सवाल यह है कि क्या पिछड़ी जातियों के दम पर राजनीति करने वाले क्षेत्रीय नेता अब कोटा की मांग छोड़ देंगे या 2024 के लोकसभा चुनावों में इसे एक बड़ा मुद्दा बनाएंगे। 2024 में महिला आरक्षण लागू नहीं होगा क्योंकि इस बिल में साफ कर दिया गया है कि 2025 तक जनगणना और चुनाव क्षेत्रों की नई सीमा तय होने के बाद ही महिला आरक्षण लागू होगा। 

नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव जैसे नेता जाति के हिसाब से जनगणना की मांग पहले से कर रहे हैं। अब इसमें महिला आरक्षण कोटा भी जुड़ जाएगा। अब कांग्रेस को पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों से ज्यादा उम्मीद है। दलित और आदिवासियों का एक वर्ग भी महिला आरक्षण में अलग से कोटा की मांग उठा रहा है। वर्तमान व्यवस्था इस वर्ग की महिलाओं को उनके वर्ग में ही आरक्षण मिलेगा। इस समय लोकसभा में दलितों के लिए 84 और आदिवासियों के लिए 41 सीटें आरक्षित हैं। दलित और आदिवासी नेता इसमें आरक्षण नहीं चाहते हैं। 2019 के चुनावों में करीब 15 प्रतिशत (80) महिलाएं जीत कर आईं। आरक्षण के बाद महिलाओं की संख्या कम से कम 180 हो जाएगी। पिछड़े नेताओं को डर है कि महिला सीटों पर मुकाबला के लिए उन्हें 10-15 साल और इंतजार करना होगा। 

कोटा के बिना क्यों आता है बिल : लोकसभा की एक संसदीय समिति ने 2010 के बाद कहा था कि पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षण पर विचार किया जाना चाहिए। लेकिन जो भी पार्टी सत्ता में रही वह पिछड़े कोटा के लिए तैयार नहीं हुई। असल में सवर्णों को महिला आरक्षण में पिछड़ों का कोटा पसंद नहीं है। पिछड़ों का कोटा होने का साफ मतलब होगा कि सवर्ण राजनीतिक तौर पर कमजोर होंगे। लोकसभा और विधानसभाओं में उनकी संख्या कम हो सकती है। कांग्रेस अब सत्ता से बाहर है और उसके साथ आई.एन.डी.आई.ए. गठबंधन में पिछड़ों के नेतृत्व वाली पार्टियां ज्यादा मजबूत हैं इसलिए कांग्रेस अब पिछड़ों के कोटा का समर्थन कर रही है। जाहिर है कि कोटा की लड़ाई अभी खत्म नहीं बल्कि शुरू हुई है।-शैलेश कुमार 
    

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